Shiva Swarodaya –
रेचको हरते पापं कुर्याद्योगपदं व्रजेत्।
पश्चातसंग्रामवत्तिष्ठेल्लयबन्धं च कारयेत्।।378।।
भावार्थ – रेचक करने से शरीर का पाप मिटता है, अर्थात् शरीर और मन के विकार दूर होते हैं। इसके अभ्यास से साधक योगपद प्राप्त करता है (अर्थात् योगी हो जाता है) और शरीर में सर्वांगीण सन्तुलन स्थापित होता है तथा साधक मृत्युजयी बनता है।
कुम्भयेत्सहजं वायुं यथाशक्ति प्रकल्पयेत्।
रेचयेच्चन्द्रमार्गेण सूर्येणापूरयेत्सुधीः।।379।।
भावार्थ – सुधी व्यक्ति को दाहिने नासिका रन्ध्र से साँस को अन्दर लेना चाहिए, फिर यथाशक्ति सहज ढंग से कुम्भक करना चाहिए और इसके बाद साँस को बाँए नासिका रन्ध्र से छोड़ना चाहिए।
चन्द्रं पिबति सूर्यश्च सूर्यं पिबति चन्द्रमाः।
अन्योन्यकालभावेन जीवेदाचन्द्रतारकम्।।380।।
भावार्थ – जो लोग चन्द्र नाड़ी से साँस अन्दर लेकर सूर्य नाड़ी से रेचन करते हैं और फिर सूर्य नाड़ी से साँस अन्दर लेकर चन्द्र नाड़ी से उसका रेचन करते हैं, वे जब तक चन्द्रमा और तारे रहते हैं तब तक जीवित रहते हैं (अर्थात् दीर्घजीवी होते हैं)। यह अनुलोम-विलोम या नाड़ी-शोधक प्राणायाम की विधि है।
स्वीयाङ्गे वहते नाडी तन्नाडीरोधनं कुरु।
मुखबन्धममुञ्चन्वै पवनं जायते युवा।।381।।
भावार्थ – अपने शरीर में जो नाड़ी प्रवाहित हो रही हो, उससे साँस अन्दर भरकर और मुँह बन्दकर यथाशक्ति आन्तरिक कुम्भक करने से वृद्ध भी युवा हो जाता है।
मुखनासिकाकर्णान्तानङ्गुलीभिर्निरोधयेत्।
तत्त्वोदयमिति ज्ञेयं षण्मुखीकरणं प्रियम्।।382।।
भावार्थ – मुख, नासिका, कान और आँखों को दोनों हाथों की उँगलियों से बन्दकर स्वर में सक्रिय तत्त्व के प्रति सचेत होने का अभ्यास करना चाहिए। इस अभ्यास को षण्मुखी मुद्रा कहते हैं।
षण्मुखी मुद्रा के अभ्यास की पूरी विधि शिवस्वरोदय के 150वें श्लोक पर चर्चा के दौरान दी गयी थी। य़ह विधि महान स्वरयोगी परमहंस स्वामी सत्यानन्द जी ने अपनी पुस्तक स्वर-योग में जिस प्रकार दी है, उसे यथावत यहाँ पुनः उद्धृत किया जा रहा है-
श्रुत्योरङ्गुष्ठकौ मध्याङ्गुल्यौ नासापुटद्वये।
वदनप्रान्तके चान्याङ्गुलीयर्दद्याच्च नेत्रयोः।।150।।
1. सर्वप्रथम किसी भी ध्यानोपयोगी आसन में बैठें।
2. आँखें बन्द कर लें, काकीमुद्रा में मुँह से साँस लें, साँस लेते समय ऐसा अनुभव करें कि प्राण मूलाधार से आज्ञाचक्र की ओर ऊपर की ओर अग्रसर हो रहा है।
3. (थोड़ा सिर इस प्रकार झुकाना है कि ठोड़ी छाती को स्पर्श न करे) और चेतना को आज्ञाचक्र पर टिकाएँ। साँस को जितनी देर तक आराम से रोक सकते हैं, अन्दर रोकें। साथ ही जैसा श्लोक में आँख, नाक, कान आदि अंगुलियों से बन्द करने को कहा गया है, वैसा करें, खेचरी मुद्रा (जीभ को उल्टा करके तालु से लगाना) के साथ अर्ध जालन्धर बन्ध लगाएँ।
4. सिर को सीधा करें और नाक से सामान्य ढंग से साँस छोड़ें।
5. यह एक चक्र हुआ। ऐसे पाँच चक्र करने चाहिए। प्रत्येक चक्र के बाद कुछ क्षणों तक विश्राम करें, आँख बन्द रखें। अभ्यास के बाद थोड़ी देर तक शांत बैठें और चिदाकाश (आँख बन्द करने पर सामने दिखने वाला रिक्त स्थान) को देखें। इसमें दिखायी पड़ने वाले रंग से सक्रिय तत्त्व की पहिचान करते हैं, अर्थात् पीले रंग से पृथ्वी, सफेद रंग से जल, लाल रंग से अग्नि, नीले या भूरे रंग से वायु और बिल्कुल काले या विभिन्न रंगों के मिश्रण से आकाश तत्त्व समझना चाहिए।
तस्य रूपं गतिः स्वादो मण्डलं लक्षणं त्विदम्।
स वेत्ति मानवो लोके संसर्गादपि मार्गवित्।।383।।
भावार्थ – जो योगी इस मुद्रा का प्रतिदिन अभ्यास करता है, वह तत्त्वों के आकार, गति, स्वाद, रंग और लक्षण को पहचानने में सक्षम हो जाता है। इससे उसके पास स्वस्थ और सफल सम्पर्क स्थापित करने की क्षमता आ जाती है।
