॥ अथ निष्क्रमणसंस्कारविधिः ॥

निष्क्रमणसंस्कारविधिः

सूर्यावलोकनम्  तथा भूम्युपवेशनम् 

नामकरणसंस्कार सम्पन्न हो जानेके बाद निष्क्रमणसंस्कारकी सामग्री यथास्थान स्थितकर हाथमें कुशाक्षत, जल लेकर निम्न संकल्प करे–

ॐ  विष्णुर्विष्णुर्विष्णु: श्रीमद्धगवतो महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य ब्रह्मणो द्वितीयपरार्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे कलिप्रथमचरणे जम्बूद्वीपे भारतवर्षे आर्यावर्तेकदेशे ( यदि काशी हो तो अविमुक्तवाराणसीक्षेत्रे आनन्दवने गौरीमुखे त्रिकण्टकविराजिते महाश्मशाने भगवत्या उत्तरवाहिन्या भागीरथ्या वामभागे) ““नगरे/ग्रामे/क्षेत्रै षष्टिसंवत्सराणां मध्ये “संवत्सरे “अयने “ऋतौ “मासे “पक्षे ““तिथौ “”नक्षत्रे “योगे ““करणे “”वासरे ““राशिस्थिते सूर्ये ““राशिस्थिते चन्द्रे शेषेषु ग्रहेषु यथायथाराशिस्थानस्थितेषु सत्सु एवं ग्रहगुणगणविशिष्टे शुभमुहूर्ते “ “गोत्रः सपत्नीकः “शर्मा” वर्मा/गुप्तोऽहं ममास्य बालस्य करिष्यमाणनिष्क्रमणकर्मणि सर्वारिष्टनिवृत्तये जले दिगीशानां दिशां चन्द्रस्य अर्कस्य वासुदेवस्य गगनस्य च पूर्वागत्वेन पूजनं करिष्ये। ऐसा कहकर संकल्प-जल छोड़ दे।

दिशाओं तथा दिग्देवता आदिका स्थापन-पूजन–

किसी पवित्र पात्रमें जल लेकर सामने रख ले और निम्न मन्त्रोंसे उस जलमें दिगीशादि देवोंपर अक्षत छोड़ते हुए उनका आवाहन एवं प्रतिष्ठापन करे

ॐ भूर्भुवः स्वः जले दिगीशादिदेवा गगनपर्यन्ता आगच्छन्तु तिष्ठन्तु सुप्रतिष्ठिता वरदा भवन्तु।’ पूजन-तदनन्तर
ॐ  दिगीशेभ्यो नमः, ॐ दिग्भ्यो नमः, ॐ चन्द्राय नमः, ॐ अर्काय नमः, ॐ वासुदेवाय नमः, ॐ गगनाय नमः–इन नाममन्त्रोंसे ध्यान करके इन्हीं नाममन्त्रोंद्वारा गन्धाक्षत, पुष्प आदि उपचारोंसे जलमें उनका पूजन करे।

प्रार्थना हाथमें फूल लेकर निम्न मन्त्रसे देवोंसे बालकको रक्षाको प्रार्थना करे-
ॐ चन्द्रार्कयोर्दिगीशानां दिशां च गगनस्य च।
निक्षेपार्थमिमं दद्धि ते मे रक्षन्तु बालकम्‌॥
अप्रमत्तं प्रमत्तं वा दिवा रात्रावथापि वा।
रक्षन्तु सततं सर्वे देवाः शक्रपुरोगमाः॥

सूर्यपूजन
तदनन्तर बालकको सूर्यदर्शन करानेके लिये माता बालकको गोदमें लेकर बाहर उस स्थानपर आ जाय, जहाँसे सूर्यदर्शन हो सके । उस समय शंख-घण्टानादपूर्वक मंगल वाद्योंकी ध्वनि तथा स्वस्तिमंगलपाठका उच्चारण होता रहे । तदनन्तर पिता तथा बालककी माता पुत्रको गोदमें लेकर यथास्थान शुभ आसनपर बैठ जायँ और किसी ताम्रपात्रमें जल, गन्धादि छोड़कर उसमें भगवान्‌ सूर्यका आवाहन तथा प्रतिष्ठा करें । तदनन्तर निम्न मन्त्रसे हाथमें रक्त पुष्पों तथा अक्षतोंद्वारा भगवान्‌ सूर्यका ध्यान करें।
ॐ पद्मासनः पद्मकरो द्विबाहुः पदाद्युतिः सप्ततुरङ्गवाहः ।
दिवाकरो लोकगुरु: किरीटी मयि प्रसादं विदधातु देव: ॥
हाथमें लाल पुष्पाक्षत लेकर ‘ ॐ आदित्याय नमः ‘ इस मन्त्रसे पुष्पादि जलमें छोड़ दे। सूर्यका यथालब्धोपचार पूजन करे और निम्न मन्त्रसे प्रार्थना करे–

ॐ आ कृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन्नमृतं मर्त्यञ्च।
हिरण्ययेन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन्‌॥

सूर्यार्घ्यदानम् 

ताम्रके पात्रमै फल, पुष्पयुक्त जल लेकर सूर्यको निम्नलिखित मन्त्रसे अर्घ्य देना चाहिये–

एहि सूर्य सहस्त्रांशो तेजोराशे जगत्पते।
अनुकम्पय मां भक्त्या गृहाणार्घ्यं दिवाकर॥

‘एषोऽर्घ्यः ब्रह्मस्वरूपिणे श्रीसूर्यनारायणाय नमः ।’

सूर्योदीक्षणविधि-

इसके बाद माताको गोदमें स्थित शिशुको पिता अथवा आचार्य निम्नलिखित मन्त्र बोलते हुए सूर्यका दर्शन कराये-

ॐ तच्चक्षुर्देवहितं पुरस्ताच्छुक्रमुच्चरत्‌।
पश्येम शरदः शतं जीवेम शरदः शतः श्रृणुयाम शरदः
शतं प्रब्रवाम शरदः शतमदीनाः स्याम शरदः शतं भूयश्च शरदः शतात्‌॥

सूर्यप्रदक्षिणा 

इसके बाद निम्न मन्त्र बोलता हुआ अपने स्थानपर ही चारों ओर तीन बार प्रदक्षिणा करे-

यानि कानि च पापानि जन्मान्तरकृतानि च।
तानि सर्वाणि नश्यन्तु प्रदक्षिण पदे पदे॥

सूर्यप्रणामाञ्जलि-
हाथमें लाल पुष्प, अक्षत लेकर निम्नलिखित मन्त्र बोलता हुआ सूर्यको प्रणाम करे
ॐ जपाकुसुमसङ्काशं काश्यपेयं महाद्युतिम्‌।
ध्वान्तारिं सर्वपापध्नं प्रणतोऽस्मि दिवाकरम्‌॥

तदनन्तर भूम्युपवेशनकर्म करे

भूम्युपवेशनम् 
बालकको सूर्यदर्शन करानेके अनन्तर पहली बार भूमिका स्पर्श कराया जाता है । अतः प्रारम्भमें गणेश आदिका स्मरण करके गोमय आदिसे भूमिको लीपकर उसपर मिट्टीसे एक गोल मण्डल बना ले। भूमिको अक्षत, पुष्पादिसे प्रतिष्ठा कर ले । तदनन्तर निम्न नाम मन्त्रोंसे भूमिदेवी, पृथ्वीका उद्धार करनेवाले भगवान्‌ वराह तथा अपने कुलदेवताका गन्धादि उपचारोंसे पूजन करे-

ॐ पृथिव्यै नमः, ॐ वाराहाय नमः, ॐ  कुलदेवतायै नमः ।

भूमिप्रार्थना
तदनन्तर निम्न मन्त्रोंसे बालककी रक्षा तथा दीर्घायुष्यके लिये भूमिदेवीको प्रार्थना करे-रक्षैनं वसुधे देवि सदा सर्वगते शुभे। आयुष्प्रमाणं निखिलं निक्षिपस्व हरिप्रिये॥

अचिरादायुषस्तस्य ये केचित्‌ परिपन्थिनः।
जीवितारोग्यवित्तेषु निर्दहस्वाचिरेण तान्‌॥
धारिण्यशेषभूतानां मातस्त्वमधिका ह्मसि।
अजरा चाप्रमेया च सर्वभूतनमस्कृते॥
त्वमेवमशेषजगतां प्रतिष्ठा चाश्रयो हासि।
कुमारं पाहि मातस्त्वं ब्रह्मा तदनुमन्यताम्‌॥

इस प्रकार भूमिको प्रार्थनाकर शंखघंटानाद करते हुए बालक को कुछ क्षणोंके लिये उस पूजित भूमिपर बैठाना चाहिये। कहीं-कहीं भूमिपर चाँदीके रुपयेकी स्थापनाकर उसपर भी बालकके दाहिने पैरका स्पर्श करानेकी परम्परा है।
तदनन्तर ब्राह्मणोंको बालकको आशीर्वाद ग्रहण कराना चाहिये । इसके अनन्तर पुन: घरके भीतर आकर कल्याणी, मंगला, भद्रा, पुण्या, पुण्यमुखी, जया तथा विजया नामवाली इन सात जीवमातृकाओंका नाम-मन्त्रसे पूजनकर उनपर वसोर्धारा (घृतधारा) देनी चाहिये ।

अथ घृतधारा
ॐ कल्याण्यै, ॐ मंगलायै, ॐ भद्रायै, ॐ पुण्यायै, ॐ पुण्यमुख्यै, ॐ जयायै, ॐ विजयायै

नामवाली से जीवमातृकाओं का नाम मन्त्रसे पूजनकर उनपर वसोर्धारा (घृतधारा) करे 

दक्षिणा-दानम् 

इसके बाद आचार्यको दक्षिणा देनी चाहिये और अन्य ब्राह्मणोंको निम्न संकल्पसे भूयसी दक्षिणा प्रदान करनी चाहिये–

 अद्य ““शर्मा/वर्मा/गुप्तो$हं कृतस्य नामकरणसूर्याद्ववलोकनपूर्वकनिष्क्रमणसंस्कारस्य साङ्गतासिद्धयर्थ न्यूनातिरिक्तदोषपरिहारार्थ नानानामगोत्रेभ्यो ब्राह्मणेभ्यो भूयसीदक्षिणां विभज्य दातुमुत्सृज्ये। कहकर अन्योंको दक्षिणा प्रदान करे और ब्राह्मण -भोजनका संकल्प करे।

ब्राह्मणभोजनसंकल्प–

ॐ अद्य ““शर्मा/वर्मा/गुप्तो$हं कृतस्य नामकरणसूर्याद्यवलोकनपूर्वकनिष्क्रमणसंस्कारस्य साङ्गताप्रतिष्ठासंसिद्धयर्थ यथासंख्याकान्‌ ब्राह्मणान्‌ भोजयिष्ये। संकल्पका जल आदि छोड़ दे और कर्मके अन्तमें ब्राह्मणोंको भोजन कराये।

अथ विसर्जनम् 

हाथमें पुष्प-अक्षत लेकर निम्नलिखित मन्त्र बोलकर आवाहित देवों तथा अग्निपर अक्षत छोड़कर उनका विसर्जन करे

यान्तु देवगणाः सर्वे पूजामादाय मामकीम्‌।
इष्टकामसमृद्ध्यर्थं पुनरागमनाय च ॥

भगवत्स्मरण-हाथमें अक्षत-पुष्प लेकर भगवानूका ध्यान करते हुए समस्त कर्म उन्हें समर्पित करे-

ॐ प्रमादात्कुर्वतां कर्म प्रच्यवेताध्वरेषु यत्‌ ।
स्मरणादेव तद्विष्णोः सम्पूर्ण स्यादिति श्रुतिः ॥
यस्य स्मृत्या च नामोक्त्या तपोयज्ञक्रियादिषु।
न्यूनं सम्पूर्णतां याति सद्यो वन्दे तमच्युतम्‌॥
यत्पादपङ्कजस्मरणात्‌ यस्य नामजपादपि।
न्यूनं कर्म भवेत्‌ पूर्ण तं वन्दे साम्बमीश्वरम्‌॥

ॐ  विष्णवे नमः। ॐ  विष्णवे नमः। ॐ  विष्णवे नमः। ॐ  साम्बसदाशिवाय नमः। ॐ  साम्बसदाशिवाय नमः । ॐ  साम्बसदाशिवाय नमः।

॥ इति  निष्क्रमणसंस्कार विधिः ॥

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