॥ गर्भाधान संस्कार ॥
गर्भाधान संस्कार

गर्भाधानसंस्कारकी सामान्य सरल विधि
वर्तमान समयमें गर्भाधानसंस्कारकी पूरी विधि सम्पन्न करनेमें जिन्हें कठिनाई प्रतीत हो तो उनके लिये संक्षिप्त एवं सरल सांकल्पिक विधि यहाँ दी जा रही है। समयाभावके कारण पंचांगपूजन नहीं करना हो तो उसके विकल्परूपमें पंचांगपूजनके निमित्त निम्नलिखित संकल्पके द्वारा आचार्यको दक्षिणा प्रदान कर दे-
सङ्कल्प
ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः श्रीमद्धगवतो महापुरुषस्य विष्णो- द्वितीयपराध्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे राज्ञया प्रवर्तमानस्य ब्रह्मणो द्वितीयपरार्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे कलिप्रथमचरणे जम्बूद्वीपे भारतवर्षे आर्यावतैकदेशे (यदि काशी हो तो अविमुक्तवाराणसीक्षेत्रे आनन्दवने गौरीमुखे त्रिकण्टकविराजिते महाश्मशाने भगवत्या उत्तरवाहिन्या भागीरथ्या वामभागे) “नगरे/ग्रामे/क्षेत्रे घष्टि- राज्ञया प्रवतंमानस्य ब्रह्मणो संवत्सराणां मध्ये संवत्सरे “”अयने “ऋतौ मासे पक्ष तिथौ “”नक्षत्रे “योगे “करणे “वासरे “राशिस्थिते सूर्ये राशिस्थिते चन्द्रे शेषेषु ग्रहेषु यथायथाराशिस्थानस्थितेषु सत्स एवं ग्रहगुणगणविशिष्टे शुभमुहूत्ते “गोत्र: शर्मा/वर्मा / गुप्तोऽहं अस्मिन् गभोधानसंस्कारकर्मणि स्वस्तिपुण्याहवाचन षोडश- मातृकापूजनं वसोधारापूजनं आयुष्यमन्त्रजप सांकल्पिक नान्दीश्राद्ध इत्येतेषां कर्मणां शास्त्रोक्तविधिपरिपालनोद्देश्येन स्वर्णं (निष्क्रयद्रव्य) “गोत्राय ब्राह्मणाय भवते सम्प्रददे।
ऐसा कहकर दक्षिणा ब्राह्मणको दे दे ।
तदनन्तर गर्भाधानात्मक मन्त्रोंका निम्न रीतिसे अपकर्षण कर ले।
गर्भाधानके मन्त्रोंके अपकर्षण करनेकी सरल विधि- मन्त्रोंका अपकर्षण करनेके लिये निम्न संकल्पके अनुसार सभी क्रियाएँ सम्पन्न करे तथा आचार्यके द्वारा इन मन्रोंका पाठ करा दे तथा उसी समय मातृका-विसर्जन आदि सभी कृत्य पूर्ण कर ले। यहाँ मन्त्रपाठ करा लेनेपर गर्भाधान संस्कारकी प्रक्रिया पूर्ण हो जाती है। सबके लिये मन्त्रका उच्चारण करना सम्भव न होनेके कारण आगे टिप्पणीमें दिये गये मन्त्रार्थकी भावना रखते हुए गर्भाधानकी क्रियाओंको सम्पन्न करे-
अपकर्षणका संकल्प-
ॐ विष्णुविष्णुविष्णुः अद्य यथोक्तगुणविशिष्टतिथ्यादौ अस्याः मम भार्याया: प्रथमगर्भातिशयद्वारा अस्थां जनिष्यमाण सर्वगर्भाणां बीजगर्भसमुद्भवैनोनिबर्हणार्थं गर्भाधानसंस्कारसम्बन्धिनिशिविहितकर्मसम्बन्धिमन्त्राणां अज्ञानादिहेतुभि: पाठासम्भवात् सम्प्रति अपकृष्य गर्भाधानाख्यसंस्कारसम्बन्धिमन्त्राणां पाठं ब्राह्मणद्वारा कारयित्वा गर्भाधानाख्यसंस्कारं करिष्ये ।
तदनन्तर आचार्य निम्न मन्त्रोंका पाठ करे-
नाभिस्पर्शका मन्त्र
इसके बाद उसी दिन या सोलह दिनसे पूर्व किसी शुभरात्रिके दूसरे पहरमें दाहिने हाथसे अपनी स्त्रीकी नाभिका स्पर्श करते हुए निम्न मन्त्र पढ़े-
ॐ विष्णुर्योंनिं कल्पयतु त्वष्टा रूपाणि पि गुँ शतु ।
आसिञ्चतु प्रजापतिर्धाता गर्भं दधातु ते।
स्त्रीको अभिमन्त्रित करनेकी विधि
इसके उपरान्त पूर्व अथवा उत्तरको मुख किये हुए पति अपनी पत्नीको निम्न मन्त्रसे अभिमन्त्रित करे –
ॐ गर्भं धेहि सिनीवालि गर्भं धेहि पृथुष्टुके।
गर्भं ते अश्विनौ देवावाधत्तां पुष्करस्रजौ।॥
वीर्यदानविधि
अनन्तर स्वस्थ और प्रसन्न मन होते हुए पति प्रसन्न हृदयवाली, उद्वेगरहित, पतिकी इच्छा करनेवाली स्त्रीको उत्तम शय्यापर दो घड़ी रात बीत जानेके बाद वीर्यदान करे। वीर्यदानके लिये निम्नलिखित मन्त्र पढ़ने चाहिये
ॐ गायत्रेण त्वा छन्दसा परिगृह्मामि त्रैष्टुभेन त्वा छन्दसा परिगृह्णामि जागतेन त्वा छन्दसा परिगृह्णामि।
सूक्ष्मा चासि शिवा चासि स्योना चासि सुषदा चास्यूर्जस्विती चासि पयस्वती च॥
ॐ रेतो मुत्रं वि जहाति योनिं प्रविशदिन्द्रियम्।
गर्भो जरायुणाऽऽवृत उल्बं जहाति जन्मना ॥
ऋतेन सत्यमिन्द्रियं विपान गुँ शुक्रमन्धस इन्द्रस्येन्द्रियिमिदं पयोऽमृत मधु ॥
हृदयालम्भन विधि
अभिगमन (वीर्यदान)-के अनन्तर पवित्र होकर आचमन करके स्त्रीको अपने वामभागमें बैठाकर उसके दाहिने कन्धेके ऊपरसे हाथ ले जाकर उसके हृदयदेशका स्पर्श करे। उस समय निम्नलिखित मन्त्रका उच्चारण करना चाहिये-
ॐ यत्ते सुसीमे हृदयं दिवि चन्द्रमसि श्रितम्।
वेदाहं तन्मां तद्विद्यात्पश्येम शरदः शतं जीवेम शरदः शत गुँ श्रृणुयाम शरदः शतम्।
तदनन्तर ताम्बूल आदिका सेवनकर रात्रिमें सुखपूर्वक शयन करे ।
प्रातःकाल स्नानादिसे निवृत्त होकर ब्राह्मणभोजनका संकल्प करे तथा आचार्यादि ब्राह्मणोंको दक्षिणा प्रदानकर मातृकाओंका विसर्जन करे।
