॥ जातकर्म संस्कारविधिः ॥

जातकर्म संस्कारविधिः

कर्म एक रिवाज होने से अधिक एक क्रिया है जो संतान के जन्म के पश्चात माँ व शिशु के पूर्णतया स्वस्थ होने पर सम्पन्न किया जाता है। जिसमें सुनिश्चित किया जाता है कि शिशु स्तनपान लेने योग्य हो । शिशु जन्म पश्चात् स्नान कराकर, स्वच्छ वस्त्र पहना कर जब माँ को दिया जाता है तब शुद्ध घी व शुद्ध शहद से निम्न मंत्र उच्चारित करते हुये यह मिश्रण नवजात शिशु को चटाया जाता है।

ॐ ते ददामि मधुनो घृतस्य वेद सवित्रा प्रसूतं मघोनाम् |
आयुष्मान् गुप्तो देवताभिः शतं जीव शरदो लोके अस्मिन् ॥ १ ॥ आश्व० ॥ .
हे बालक, तुझको घी और शहदकी यह वुन्द मैं देता हूं। इस घृत और मधुको सब धन-सम्पतियों के स्रष्टा परमेश्वर ने ही उत्पन्न किया है ऐसा मैं समझता हूँ । इस संसार में तूम विद्वानों द्वारा रक्षित होकर सैकड़ों वर्ष तक जो ॥ १ ॥
मेघां ते मित्रावरुणौ येधामग्निर्दधातु ते ।
मेधां ते अश्विनौ देवावाधत्तां पुष्करस्रजो ॥ २ ॥ मं० ना० ॥
मैत्र, बरुण, अग्नि और सुन्दर अश्विन देवता, ये सब भौतिक शक्तियां तेरी बुद्धिको तीब्र बनादे ,

ॐ भूः स त्वयि दधामि।
ॐ भुवः स त्वयि दधामि।
ॐ स्वः स त्वयि दधामि।
ॐ भूर्भुवः स्वः सर्वं त्वयि दधामि
आयुष्यकरण में शिशु के दाये कान में निम्न 9 मंत्र सही उच्चारण के साथ पिता या किसी भी घर के बड़े सदस्य द्वारा उच्चारित किये जाते है।

ॐ अग्निः आयुष्मान् स वनस्पतिभिः आयुष्मान् स तेन त्वं आयुष्मन्तं करोमि ।
ॐ सोम आयुष्मान् स औषधिभिः आयुष्मान् स तेन त्वं आयुष्मन्तं करोमि ।
ॐ ब्रह्म आयुष्मत् तद् ब्राह्मणैरायुष्मत्तेन त्वं आयुष्मन्तं करोमि ।
ॐ देवा आयुष्मन्तस्ते अमृतेन आयुष्मन्तस्तेन त्वं आयुष्मन्तं करोमि ।
ॐ ऋषयः आयुष्मन्तस्ते व्रतैः आयुष्मन्तस्तेन त्वं आयुष्मन्तं करोमि ।
ॐ पितर आयुष्मन्तस्ते स्वधामि आयुष्मन्तस्तेन त्वं आयुष्मन्तं करोमि ।
ॐ यज्ञ आयुष्मान्स दक्षिणाभिः आयुष्मांस्तेन स तेन त्वं आयुष्मन्तं करोमि ।
ॐ समुद्र आयुष्मान् स स्रवन्तीभिः आयुष्मांस्तेन त्वं आयुष्मन्तं करोमि ।
इसके पश्चात् पिता अपनी संतान को आशीर्वाद देते है ।

॥ अश्मा भव, परशुर्भव , हिरण्यमस्तृतं भव वेदो वै पुत्रनामासि स जीव शरदः शतम्‌ ॥३॥

अर्थात् तुम पाषाण की तरह बलवान बनो, विरोधियों के समक्ष महान ऋषि परशुराम की तरह अजेय बनो और खरे स्वर्ण के समान हमेशा पवित्र रहो। इसके पश्चात् परिवार के सभी सदस्य नवजात शिशु व माँ के अच्छे स्वास्थ्य की कामना करते हैं व आशीर्वाद देते हैं।

त्र्यायुषं जमदग्नेः कस्यपस्य त्र्यायुषम्‌। यद्देवेषु त्र्यायुषं तन्नो अस्तु त्र्याषम्‌ ॥ १॥

॥ जातकर्म संस्कारविधिः ॥

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