॥ पुंसवनसंस्कार ॥

॥ पुंसवनसंस्कार ॥

पुंसवन संस्कार प्रयोग

पुंसवनसंस्कार करनेवाला व्यक्ति ज्योतिषीके द्वारा निर्दिष्ट शुभ मुहूर्तमें नित्य-क्रिया सम्पन्न करके स्नानादिसे पवित्र होकर पूर्वमुख बैठकर अपने दाहिने भागमें पत्नीको बैठाकर दीप प्रज्चलितकर आचमन, प्राणायाम, आसनशुद्धि आदि करके पुंसवनसंस्कार सम्पन्न करनेके लिये निम्न संकल्प करे। उस दिन पति अपनी पत्नीको उपवास कराकर (भोजन आदि न कराकर) कार्य सम्पन्न करे।

प्रतिज्ञा संकल्प
दाहिने हाथमें जल, अक्षत, पुष्प, फल और द्रव्य लेकर निम्नलिखित संकल्प करे-

ॐ विष्णुर्वि्णुर्विष्णु: श्रीमद्धगवतो महापुरुषस्य विष्णो- राज्ञया प्रवर्तमानस्य ब्रह्मणो द्वितीयपराधें श्रीश्वेतवाराहकल्ये वैवस्वतमन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे कलिप्रथमचरणे जम्बूद्वीपे भारतवर्ष आर्यावतैंकदेशे ( यदि काशी हो तो अविमुक्तवाराणसीक्षेत्रे आनन्दवने गौरीमुखे त्रिकण्टकविराजिते महाश्मशाने भगवत्या उत्तरवाहिन्या षष्टिसंवत्सराणां मध्ये “संवत्सरे “”अयने “ऋतौ “मासे “पक्षे “तिथौ “नक्षत्रे “योगे “करणे “वासरे “राशिस्थिते सू्े राशिस्थिते चन्द्रे शेषेषु ग्रहेषु यथायथाराशिस्थानस्थितेषु सत्सु एवं ग्रहगुणगणविशिष्टे शुभमुहूत्ते “गोत्रः सपतनीक: “शर्मा/ वर्मा/गुप्तोहं ममास्यां भार्यायां विद्यमानगर्भपुंस्त्वप्रति- पादनबीजगर्भसमुद्भवैनोनिबर्हणद्वारा पुंरूपतोदयप्रतिरोधककर्म- परिहारद्वारा च श्रीपरमेश्वरप्रीतये पुंसवनाख्यसंस्कारकर्म करिष्ये। तत्र पूर्वांगतया गणेशाम्बिकापूजनं स्वस्तिपुण्याहवाचनं मातृकापूजनं सांकल्पिकेन विधिना नान्दीमुखश्राद्धं च करिष्ये ।

पुंसवन संस्कार में प्रधान कर्म
मातृपूजा आदि सम्पन्न करके वटवृक्षके निचले भागमें उत्पन्न अंकुरों तथा वटवृक्षकी शाखाओंके ऊपर अग्रभागमें उत्पन्न नूतन पल्लवोंके बीचमें उत्पन्न हुए अंकुरों एवं कुशकी जड़ तथा सोमलता (अभावमें पूतिका अथवा दूर्वा)-को लाकर स्वच्छ जलके साथ पीस ले तथा उस रसको स्वच्छ वस्त्रसे छानकर किसी पात्रमें सुरक्षित रख ले। तदनन्तर स्त्रीकी नासिकाके दाहिने छिद्रमें पति रस डाले।

आसेचन के मन्त्र  रस डालते समय निम्न दो मन्त्रोंका पाठ करे-

ॐ हिरण्यगर्भ: समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत्।
स दाधार पृथिर्वीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥

अद्भ्यः सम्भृतः पृथिव्यै रसाच्च विश्वकर्मणः समवर्तताग्रे।
तस्य त्वष्टा विदधद्रूपमेति तन्मर्त्यस्य देवत्वमाजानमग्रे॥

वीर्यवान् पुत्रप्राप्तिके लिये सकाम प्रयोग
यदि वीर्यवान् पुत्र होयह कामना हो तो पति जलसे पूर्ण एक पात्रको भार्याकी गोदमें रखकर अनामिका अँगुलीसे स्त्रीके गर्भका स्पर्श करते हुए निम्न मन्त्रका पाठ करते हुए गर्भका अभिमन्त्रण करे-

ॐ सुपर्णोऽसि गरुत्माँस्त्रिवृत्ते शिरो गायत्रं चक्षुर्बृहद्रथन्तरे पक्षौ।
स्तोम आत्मा छन्दा गुँ स्यंगानि यजू गुँ सि नाम।
साम ते तनूर्वामदेव्यं यज्ञायज्ञियं पुच्छं धिष्ण्याः शफाः।
सुपर्णोऽसि गरुत्मान् दिवं गच्छ स्वः पत॥

दक्षिणा संकल्प
इसके बाद ब्राह्मणको दक्षिणा देनी चाहिये और दस अथवा यथाशक्ति ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये। उसके लिये निम्नलिखित संकल्प करना चाहिये-

ॐ अद्य यथोक्तगुणविशिष्टतिथ्यादौ “गोत्र: शर्मा/ वर्मा/गुप्तोऽहं कृतस्यास्य पुंसवनाख्यकर्मण: साद्गुण्यार्थमिमां दक्षिणां ब्राह्मणेभ्यो विभज्य दास्ये। यथासंख्याकान् ब्राह्मणान् भोजयिष्ये।

अभिषेक विधि
इसके बाद आचार्य कलशके जलसे निम्न मन्त्रोंका पाठ करते हुए अभिषेक करे-

ॐ पयः पृथिव्यां पय ओषधीषु पयो दिव्यन्तरिक्षे पयो धाः।
पयस्वतीः प्रदिशः सन्तु महयम्॥

ॐ पञ्च नद्यः सरस्वतीमपि यन्ति सस्रोतसः ।
सरस्वती तु पञ्चधा सो देशेऽभवत्सरित्॥

ॐ वरुणस्योत्तम्भनमसि वरुणस्य स्कम्भसर्जनी स्थो वरुणस्य
ऋतसदन्यसि वरुणस्य ऋतसदनमसि वरुणस्य ऋ्तसदनमा सीद॥

ॐ पुनन्तु मा देवजनाः पुनन्तु मनसा धियः।
पुनन्तु विश्वा भूतानि जातवेदः पुनीहि मा॥

ॐ देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेऽश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्याम्।
सरस्वत्यै वाचो यन्तुर्यन्त्रिये दधामि बृहस्पतेष्ट्वा साम्राज्येनाभि षिञ्चाम्यसौ।

अभिषेकके अनन्तर ब्राह्मणोंका आशीवाद ग्रहणकर मातृगणोंका विसर्जन करे और अनेन पुंसवनाख्येन कर्मणा भगवान् श्रीपरमेश्वरः प्रीयताम्- कहकर कर्म भगवानको निवेदित कर दे।

विशेष बात यह पुंसवनसंस्कार समयपर न हो सके तो सीमन्तोन्नयनके साथ करना चाहिये। जैसा कि बृहस्पतिने कहा है कि यह पुंसवन संस्कार गर्भ चलन के पहले न किया गया हो तो गर्भ के चलने पर भी सीमन्तोन्नयन के पूर्व अवश्य करना चाहिये। पंचांग पूजन तथा हवन आदि कार्य सम्पन्न करके पहले पुंसवन की विधि पूर्ण करनेके अनन्तर सीमन्तोन्नयन की विधि सम्पन्न करे।

 

॥ पुंसवनसंस्कार सम्पन्न हुआ ॥

 

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