॥ विद्यारम्भ संस्कार हिंदी मे ॥
विद्यारम्भसंस्कार-प्रयोग
बच्चे को स्कूल कब शुरू करना चाहिए, इस बारे में पारस्कर गृह्यसूत्र भी मौन है। कुछ ग्रन्थों में यह भी कहा गया है कि वेदारंभ को विद्यारंभ मानना चाहिए और उसका पालन उपनयन संस्कार पश्चात करना चाहिए। हालाँकि, अक्षरों को जाने बिना वेद मंत्र को पढ़ना संभव नहीं है, और उपनयन के बिना वेद मंत्र में अधिकार नहीं है, इसलिए मैं विद्यारम्भा को अक्षरारम्भ के संस्कार के रूप में लेना उचित समझता हूँ। उपनयन में वेदारंभ की विधिवत् प्रक्रिया तो उपनयन के वाद होता है वेदारम्भ दुसरा संस्कार है ।
बालकके पाँचवें वर्षमें उसका विद्यारम्भ-संस्कार करना चाहिये अर्थात् उसे अक्षरोंका ज्ञान कराना चाहिये।
संस्कारमयूखमें मार्कण्डेयजीका वचन है-
‘प्राप्तेSथ पञ्चमे वर्षे विद्यारम्भं तु कारयेत्।
अक्षरारम्भ-संस्कारमें गुरुद्वारा भगवानके स्मरणपूर्वक बालकको लिखना-पढ़ना प्रारम्भ कराया जाता है। लोकमें इस संस्कारको पाटीपूजन’ के नामसे भी जाना जाता है। यह संस्कार बालकके पाँचवें वर्षमें किया जाता है।
श्रीवशिष्ठ संहिता, नक्षत्र स्वरूप अध्याय, श्लोक ४३
तीन पूर्व (पूर्वाफाल्गुनी, पूर्वाषाढ़ा, पूर्वा भाद्रभद्र), मूल, मृगशिरा, ये पांच और अश्विनी, भरणी, कृतिका और हस्त और श्रवण ये दिन अध्ययन के लिए शुभ दिन हैं।
विद्यारम्भ संस्कार के लिए सामान्य तैयारी के अतिरिक्त नीचे लिखी व्यवस्थाएँ पहले से ही बना लेनी चाहिए।
१. पूजन के लिए गणेशजी एवं माँ सरस्वती के चित्र या प्रतिमाएँ।
२. पट्टी, दवात और लेखनी, पूजन के लिए। बच्चे को लिखने में सुविधा हो, इसके लिए स्लेट, खड़िया भी रखी जा सकती है।
३. गुरु पूजन के लिए प्रतीक रूप में नारियल रखा जा सकता है। बालक के शिक्षक प्रत्यक्ष में हों, तो उनका पूजन भी कराया जा सकता है।
विशेष कर्मकाण्ड- मङ्गलाचरण से लेकर रक्षाविधान तक के क्रम पूरे करके विशेष कर्मकाण्ड कराया जाता है।
किसी शुभ दिनमें शुभ मुहू्तमें स्नानादिसे निवृत्त हो पवित्र वस्त्रोंको धारणकर भी स्नानादिसे निवृत्त करा ले। पूजास्थलपर आ जाय, बालकको भी स्नानादिसे निवृत्त करा ले। संस्कार एवं पूजन-सम्बन्धी सभी सामग्रियोंकों यथास्थान रख ले। अपने आसनपर पूर्वाभिमुख बैठ जाय। दीपक प्रज्वलित कर ले। पूजास्थलपर आ जाय, बालकको आचमन, प्राणायाम तथा पवित्रीधारण आदि कर्म कर ले। दाहिने हाथमें जल, अक्षत, पुष्पादि लेकर अक्षरारम्भ-संस्कार सम्पन्न करनेके लिये प्रधान संकल्प करे।
प्रतिज्ञा-संकल्प
ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः श्रीमद्भगवतो महापुरुषस्य विष्णो: आज्ञया प्रवर्तमानस्य बह्मणो द्वितीयपरार्धे श्री श्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे कलिप्रथमचरणे जम्बूद्वीपे भारतवर्षे आर्यावर्तैकदेशे ….. देशे ….. प्रदेशे ….. नगरे /ग्रामे …..क्षेत्रे षष्टिसंवत्सराणां मध्ये ….. संवत्सरे ….. अयने ….. ऋतौ ….. मासे ….. पक्षे ….. तिथौ ….. नक्षत्रे ….. योगे ….. करणे ….. वासरे ….. राशिस्थिते सूर्ये …..राशिस्थिते चन्द्रे शेषेषु ग्रहेषु यथा यथाराशिस्थान स्थितेषु सत्सु एवं ग्रहगुणगण विशेषेण विशिष्टायं शुभमुहूर्ते ….. गोत्रः सपत्नीकः …..शर्मा/ वर्मा/गुप्तोऽहं ….. राशेः ….. नाम्नः मम पुत्रस्य लेखनवाचनादि- विपुलविद्याज्ञानप्राप्तये श्रीपरमेश्वरप्रीत्यर्थं अक्षरारम्भ संस्कारं करिष्ये।
देवताओंकी स्थापना- गणेश-पूजनके अनन्तर किसी वेदिका अथवा काष्ठ पीठ पर नवीन श्वेत वस्त्र बिछा ले तथा उसमें श्वेत चावलोंके द्वारा एक अष्टदल कमलकी संरचना करे। उस अष्टदलकमल में गणेश, सरस्वती, कुलदेवता, गुरु तथा लक्ष्मीनारायणकी स्थापना करे।
तदनन्तर उसी वेदिका या पीठपर पंक्तिबद्धरूपसे अक्षतपुंजोंको रखते हुए क्रमशः नारद, पाणिनी, पतंजली, कपिल, कात्ययन, पारस्कर, यास्क, कपिंजल, गोभिल, जैमिनि, विश्वकर्मा, आचार्य (देवगुरु बृहस्पति) तथा व्यास- इन विद्याके आचार्योंकी स्थापना करे। साथ ही वेद, व्याकरणशास्त्र आदि ग्रन्थोंको भी स्थापित आदि ग्रन्थोंको भी स्थापित करे।
प्रतिष्ठा-निम्न मन्त्रसे अक्षत छोड़ते हुए सबकी प्रतिष्ठा करे-
ॐ एतन्ते देव सवितुर्यज्ञ प्राहुर्बृहस्पतये ब्रह्मणे। तेन यज्ञमव तेन यज्ञपतिं तेन मामव ।
गणेशादिदेवाः नारदादिदेवर्षयः विद्याचायश्च सुप्रतिष्ठिताः वरदा भवन्तु।
पूजन तदनन्तर नाममन्त्रोंके द्वारा यथालब्धोपचार सबका पूजन करे।
यथा-
ॐ गणेशाय नमः सर्वोपचारार्थे गन्धाक्षतपुष्पाणि समर्पयामि, नमस्करोमि।
ॐ सरस्वत्यै नमः सर्वोपचारार्थे गन्धाक्षतपुष्पाणि समर्पयामि, नमस्करोमि।
ॐ सरस्वत्यै नम: सर्वोपचारार्थे गन्धाक्षतपुष्पाणि समर्पयामि, नमस्करोमि।
ॐ कुलदेवतायै नमः सर्वोपचारार्थे गन्धाक्षतपुष्पाणि नमस्करोमि।
ॐ गुरवे नमः सर्वोपचारार्थ गन्धाक्षतपुष्पाणि समर्पयामि, नमस्करोमि
ॐ लक्ष्मीनारायणाभ्यां नमः गन्धाक्षतपुष्याणि समर्पयामि, नमस्करोमि।
तदनन्तर ऋषियों तथा विद्याचार्योंका भी नाममन्त्रसे पूजन करे।
यथा
ॐ नारदाय सर्वोपचारार्थ गन्धाक्षतपुष्पाणि समर्पयामि, नमस्करोमि
ॐ पाणिनये नमः सर्वोपचारार्थ गन्धाक्षतपुष्पाणि समर्पयामि, नमस्करोमि
ॐ पतञ्जलये नमः सर्वोपचारार्थ गन्धाक्षतपुष्पाणि समर्पयामि, नमस्करोमि
इत्यादि।
पूजनके अनन्तर हाथमें पुष्प लेकर निम्न मन्त्रसे सभी विद्याओंको अधिष्ठात्री देवी सरस्वतीकी प्रार्थना करे और पुष्प चढ़ा दे।
सर्वंविद्ये त्वमाधारः स्मृतिज्ञानप्रदायिके।
प्रसन्ना वरदा भूत्वा देहि विद्यां स्मृत्ति यशः॥
अन्तमें बोले-
अनया पूजया आवाहितदेवताः प्रीयन्तां न मम।
इस प्रकार पूजनकर निम्न रीतिसे हवन करे-
हवन जो लोग हवन करना चाहें, उनके लिये यहाँ संक्षेपमें हवनविधि दी जा रही है।
किसी स्थण्डिल अथवा वेदीके पंचभूसंस्कार करके उसमें पुष्टिवर्धन नामक अग्निकी स्थापना करके उसका गन्धादि उपचारोंसे पूजन करें । तदनन्तर ब्रह्माका वरण करके कुशकण्डिका करे और फिर घृतके द्वारा निम्न मन्त्रोंसे एक-एक आहुति प्रदान करे–
ॐ प्रजापतये स्वाहा, इदं प्रजापतये न मम।
ॐ इन्द्राय स्वाहा, इदं इन्द्राय न मम।
ॐ अग्नये स्वाहा, इदं अग्नये न मम।
ॐ सोमाय स्वाहा, इदं सोमाय न मम।
इस प्रकार आघार एवं आज्यभागकी चार आहुति देनेके अनन्तर गणेशादि सभी आवाहित देवताओंके नाममन्त्रोंसे क्रमसे पृथक् -पृथक् आठ-आठ आहुति घीद्वारा प्रदान करे।
यथा
ॐ गणेशाय स्वाहा (८),
ॐ सरस्वत्यै स्वाहा (८),
ॐ कुलदेवतायै स्वाहा (८),
ॐ गुरवे स्वाहा (८),
ॐ लक्ष्मीनारायणाभ्यां स्वाहा (८) आदि।
तदनन्तर ऋषियों तथा विद्याचार्योंके नामसे प्रत्येकके लिये आठ-आठ आहुति घीसे दे-
ॐ नारदाय स्वाहा,
ॐ पाणिनये स्वाहा आदि।
भूरादि नवाहुति- पुनः घीद्वारा निम्न मन्त्रोंसे एक-एक आहुति प्रदान करे-
१-ॐ भूः स्वाहा, इदमग्नये न मम।
२-ॐ भुवः स्वाहा, इदं वायवे न मम ।
३-ॐ स्वः स्वाहा, इदं सूर्याय न मम।
४-ॐ त्वं नो अग्ने वरुणस्य विद्वान् देवस्य हेडो अव यासिसीष्ठाः।
यजिष्ठो वहिनतमः शोशुचानो विश्वा द्वेषा गुँ सि प्र मुमुध्यस्मत्स्वाहा, इदमग्नीवरुणाभ्यां न मम।
५-ॐ स त्वं नो अग्नेऽवमो भवोती नेदिष्ठो अस्या उषसो व्युष्टौ।
अव यक्ष्व नो वरुण गुँ रराणो वीहि मृडीक गुँ सुहवो न एधि स्वाहा। इदमग्नीवरुणाभ्यां न मम।
६-ॐ अयाश्चाग्नेऽस्यनभिशस्तिपाश्च सत्यमित्त्वमया असि।
अया नो यज्ञं वहास्यया नो धेहि भिषज गुँ स्वाहा। इदमग्नये ऽअयसे न मम।
७-ॐ ये ते शतं वरुण ये सहस्रं यज्ञिया: पाशा वितता महान्तः।
तेभिनों ऽअद्य सवितोतद्विष्णुर्विश्वे मुञ्चन्तु मरुतः स्वर्काः स्वाहा॥
इदं वरुणाय सवित्रे विष्णवे विश्वेभ्यो देवेभ्यो मरुद्भ्यः स्वर्कभ्यश्च न मम।
८-ॐ उदुत्तमं वरुण पाशमस्मदवाधमं वि मध्यम गुँ श्रथाय।
अथा वयमादित्य व्रते तवानागसो अदितये स्याम स्वाहा।॥। इद वरुणायादित्यायादितये न मम।
तदनन्तर प्रजापति देवताका ध्यानकर मनमें निम्न मन्त्रका उच्चारणकर आहुति दे ।
१-(मौन होकर) ॐ प्रजापतये स्वाहा, इदं प्रजापतये न मम।
स्विष्टकृत् आहुति- इसके बाद ब्रह्माद्वारा कुशसे स्पर्श किये जानेकी स्थितिमें निम्न मन्त्रसे घृतद्वारा स्विष्टकृत् आहुति दे-
ॐ अग्नये स्विष्टकृते स्वाहा, इदमग्नये स्विष्टकृते न मम।
तदनन्तर संस्रवप्राशन (प्रणीतामें स्थित घृतयुक्त जलका किचित् पान) तथा मार्जन एवं ब्रह्माको पूर्णपात्रदान आदि क्रियाएँ सम्पन्न करे
अक्षरारम्भकी विधि
इस प्रकार देवपूजन तथा हवनके अनन्तर आभ्यंगस्नान किये हुए तथा वस्त्रालंकारों और चन्दनादिसे विभूषित बालकको अपने समीप ले आये और उसके द्वारा गणेशादि देवोंको प्रणाम कराये। तदनन्तर पश्चिमाभिमुख बालकको पूर्वाभिमुख गुरुके सामने बैठाये ।
गुरुनमस्कार-
बालकद्वारा निम्न मन्त्रसे गुरुकों नमस्कार करवाये-
अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानाज्जनशलाकया।
चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः ।।
गुरुको प्रणाम करनेके अनन्तर बालकद्वारा निम्न मन्त्रसे वागधिष्ठात्री देवी सरस्वतीको प्रणाम करवाना चाहिये
ॐ सरस्वति नमस्तुभ्यं वरदे कामरुपिणि ।
विश्ववन्द्ये विशालाक्षि विद्यां देहि नमोस्तु ते ।।
तदनन्तर बालकके द्वारा गन्धाक्षत पुष्प द्वारा गुरु तथा सरस्वतीका संक्षेपमें पूजन कराये।
गुरुद्वारा-लेखन तथा वाचन- तदनन्तर विद्याप्रदाता गुरु किसी चाँदीकी पाटी अथवा काष्ठकी पाटीपर कुंकुमादिका लेपन करके उस पाटीका पूजन करके सोने अथवा चाँदीकी शलाकासे निम्न अक्षरादिको लिखे-
श्रीगणेशाय नमः । श्रीसरस्वत्यै नमः,
श्रीकुलदेवतायै नमः, श्रीगुरुभ्यो नमः,
श्रीलक्ष्मीनारायणाभ्यां नमः । ॐ नमः सिद्धम्।
तदनन्तर वर्णाक्षरोंको भी लिखे-
अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ऋ, लृ, ए, ऐ, ओ, औ, अं, अ: ।
क ख ग घ ङ् ।
च छ ज झ ज ञ ।
ट ठ ड ढ ण।
त थ द ध न।
प फ ब भ म।
य र ल व।
श ष स ह क्ष त्र ज्ञ।
इस प्रकार पाटीपर देवताओं तथा अक्षरोंको लिखनेके अनन्तर निम्न मन्त्रसे अक्षरांकित सरस्वतीरूपा उस पाटीका निम्न मन्त्रद्वारा गन्धादि उपचारोंसे पूजन करे-
ॐ पावका नः सरस्वती वाजेभिर्वाजिनीवती। यजं वष्टु धियावसुः ।॥
ॐ लिखितसरस्वत्यै नमः ।
बालकद्वारा लेखन-वाचन तदनन्तर आचार्य बालकके दाहिने हाथमें लेखनी पकड़ाकर उसके हाथद्धारा इन अक्षरोंपर तीन बार लेखनी चलवाये तथा धीरे- धीरे उच्चारणका अभ्यास करायें इसके बाद बालकका पिता बालकद्वारा गुरु तथा पाटीकी तीन प्रदक्षिणा कराये। बालकद्वारा गुरुको उष्णीष (पगड़ी) वस्त्र आदि प्रदान कराये । उनकी पूजा करे तथा सुवासिनियाँ कुमारकी आरती करे। पिता आचार्यको दक्षिणा प्रदानकर निम्न संकल्पद्वारा अन्य ब्राह्मणोंको भुयसी दक्षिणा प्रदान करे-
भूयसीदक्षिणा-संकल्प
ॐ अद्य पूर्वोच्चारितग्रहगुणगणविशेषणविशिष्टायां शुभ- पुण्यतिथौ अमुक राशे: बालकस्य अक्षरस्वीकारविद्यारम्भकर्मणोरङ्गत्वेन अक्षतपुञ्जेषु गणेशादिदेवानां पूजनस्य होमकर्मणश्च साद्गुण्यार्थं साड़फलप्रापत्यर्थे चेमां दक्षिणां नानानामगोत्रेभ्यो ब्राह्मणेभ्यो सांगतफलप्राप्त्यर्थं च इमां दक्षिणां नानानामगोत्रेभ्यो ब्राह्मणेभ्यो विभज्य दास्ये ॐ न मम।
संकल्पजल छोड़ दे और दक्षिणा प्रदान करे।
विसर्जन- इसके बाद आवाहित सभी देवताओंपर अक्षत-पुष्प समर्पितकर निम्न मन्त्रसे विसर्जन करे-
यान्तु देवगणाः सर्वे पूजामादाय मामकीम्।
इष्टकामसमृद्ध्यर्थं पुनरागमनाय च ।।
भगवानका ध्यान –
हाथमें अक्षत-पुष्प लेकर भगवानका ध्यान करते हुए समस्त कर्म उन्हें समर्पित करे-
ॐ प्रमादात्कुर्वतां कर्मं प्रच्यवेताध्वरेषु यत्।
स्मरणादेव तद्विष्णोः सम्पूर्ण स्यादिति श्रुतिः ॥
यस्य स्मृत्या च नामोक्त्या तपोयज्ञक्रियादिषु।
न्यूनं सम्पूर्णतां याति सद्यो वन्दे तमच्युतम् ॥
ॐ विष्णवे नमः । विष्णवे नमः। ॐ विष्णवे नमः ।
