॥ सीमन्तोन्नयन संस्कार ॥
सीमन्तोन्नयन संस्कार
गर्भिणी की अवस्था का प्रभाव गर्भ पर पड़ता है। यदि वह प्रसन्न रहती है, तो सन्तति उज्ज्वल होती है। इसी हेतु सीमन्तोन्नयन संस्कार का विधान शास्त्रों में किया गया है। सीमन्त केशवेश को कहते हैं। पति ही इस संस्कार का कर्ता है।
प्रयोग
पञ्चम मास के शुभ मुहूर्त में दिन में ही पहले गणेश पूजन करे। पश्चात् प्रधान सङ्कल्प करने का विधान है।
प्रधान सङ्कल्प
अहामुकोऽहम् अस्यां भार्यायां गर्भाभिवृद्धिपरिपन्थिपिशितप्रियाऽलक्ष्मीभूतराक्षसगणनिरसनक्षमसकलसौभाग्यनिदानभूतलक्ष्मीसमावेशनद्वारा प्रतिगर्भं बीजगर्भसमुद्भवैनोनिबर्हणाय श्रीपरमेश्वरप्रीतये स्त्रीसंस्काररूपं सीमन्तोन्नयनाख्यं कर्म करिष्ये ।
मातृकापूजादि करके बाहर शाला में स्थण्डिल बनाकर पञ्चभूसंस्कारपूर्वक अग्नि की स्थापना करके उसके ईशानकोण में कलशविधि से कलश स्थापन करके आचार्य और ब्रह्मा का वरण कर ब्रह्मोपवेशन करे, पश्चात् विशेष उपकल्पनीय वस्तुओं का आसादन (स्थापन) करे।
तथा हि-
आज्यस्थाली, चरुस्थाली, आज्य (घी), मुद्ग (मूंग), तिल, अपक्व गूलर के दो फल एक गुच्छे में लगे हुए, दर्भ (कुश), त्र्येणी (तीन स्थानों में रक्त) शल्लकी (शाही के काँटे), सरकण्डे की सींक या पीपल का शङ्कु, पूर्णपात्र, सूत्र से पूर्ण लोहे की कील, वीणा- गायक (दो)। पवित्रछेदन से लेकर पर्युक्षणपर्यन्त कर्म करके (कुशकण्डिका विधान में ) चरु -पाक करे। जब आधा पक जाय, तो तिलमिश्रित चावल उसमें डाले। इस प्रकार चरु पकाकर चरु और आज्य का उद्वासन करके द्रव्य त्याग करे।
हवन सङ्कल्प
अद्येहामुकोऽहमस्मिन् सीमन्तहोमकर्मणि आज्येन आघाराज्य- भागदेवताभ्यस्तिलमिश्रितमुद्गस्थालीपाकेन प्रजापतिं स्विष्टकृतं तथाऽऽज्येन भूरादिनवाहुतीर्यक्ष्ये ।
अग्निपूजनम् प्रतिष्ठा
अग्नि की प्रतिष्ठा एवं पूजन
ॐ मङ्गलनामाग्ने सुप्रतिष्ठितो वरदो भव । मङ्गलनामाग्नये नमः ।
इस मन्त्र से पाद्य, अर्घ्य आदि से पूजन करके आधार और आज्यभाग होम करे (इन्द्र और प्रजापति के निमित्त ऐसी आहुति हो, जो गुणित चिह्न का आकार ले, उसे आधार कहते हैं। अग्नि और सोम के लिए जो आहुति दी जाय, उसे आज्यभाग कहते हैं)। ये आहुतियाँ आज्य से दी जाती हैं।
आघार- होम-
ॐ प्रजापतये स्वाहा, इदं प्रजापतये न मम ।
ॐ इन्द्राय स्वाहा, इदमिन्द्राय न मम ।
आज्यभाग होम
ॐ अग्नये स्वाहा, इदमग्नये न मम। ॐ सोमाय स्वाहा, इदं सोमाय न मम।
पश्चात् आज्यमिश्रित स्थालीपाक से होम करे ।
हवन
ॐ प्रजापतये स्वाहा, इदं प्रजापतये न मम ।
ॐ अग्नये स्विष्टकृते स्वाहा, इदमग्नये स्विष्टकृते न मम ।
इसके बाद आज्य से भूरादि होम करके संस्रवप्राशन, पूर्णपात्र- दान, होम-दक्षिणा का विधान करे।
सीमन्तोन्नयन
तत्पश्चात् पति के वामभाग में भद्रपीठ के ऊपर कोमल आसन पर बैठी हुई स्त्री के सीमन्त केश में एक गुच्छ वाले गूलर के दोनों फल, तीन दर्भ, त्र्येणी शल्लकी, सरकण्डे की सींक, लोह कील द्वारा ललाट के बीच से लेकर दो भाग करे और यह मन्त्र पढ़े-
‘ॐ भूर्विनयानि ॐ भुवर्विनयानि ॐ स्वर्विनयानि ।’
इस प्रकार तीन बार विनयन करके गूलरादि सामग्री एकीकृत उसकी वेणी में बाँधे ।
वहाँ मन्त्र बोले-
‘ॐ अयमूर्जावतोव्वृक्ष उज्जीव फलिनी भव ।’
वीणागान
इसके बाद वीणागाथी को प्रैष दे-
ॐ सोमं राजानं गायेथां यो वाऽप्यन्यो वीतता ।
(उनके सामने यह पढ़ना ही प्रेष है) प्रेषित होकर वे गान करें।
‘ॐ सोम एव नो राजेमा मानुषीः प्रजाः ।
अविमुक्तचक्र आसीरस्तीरे तुभ्यमसौ ‘ ॥
यह मन्त्र पढ़े। गर्भिणी के समीप में गङ्गादि पवित्र नदियों का नाम भी लेना चाहिए।
इसके बाद दक्षिणा का सङ्कल्प करे ।
दक्षिणादान-सङ्कल्प
अद्येहामुकोऽहमस्या भार्यायाः सीमन्तोन्नयनकर्मणः साद्गुण्यार्थम् इमां दक्षिणां भोजनं च ब्राह्मणेभ्यो विभज्य दास्ये ॐ तत्सत्।
दक्षिणा अभिषेक, तिलक, रक्षा, घृतच्छाया, त्र्यायुष्यमन्त्रपाठादि भी कराये।
।। इति सीमन्तोन्नयन संस्कार ।।
