॥ विशषमन्त्रपुष्पम् ॥

हरि: ॐ अग्निमीले पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजं होतारं रत्नधातमम्  ॥ ( ऋग्वेद )
हरि: ॐ इषे त्वोर्जे त्वा वायवस्थोवायवस्थ देवो वः सविता. ती प्रार्पयतु श्रेष्ठतमाय कर्मणे। ( यजुर्वेद )
हरि: ॐ अग्न आयाहि वीतये गृह्णानो हव्यदातये, निहोता सत्सि वर्हिषि । (सामवेद)
हरि: ॐ शन्नो देवीरभिष्टये आपो भवन्तु पीतये शंयोर भिस्श्रवन्तु नः। (अथर्ववेद)
ओमित्यग्रे व्याहरेत्, नम इति पश्चात्, नारायणायेत्युपरिष्टात्, ॐ इत्येकाक्षरं, नम इति द्वे अक्षरे, नारायणायेति पञ्चाक्षराणि, एतद्वै नारायणस्याष्टाक्षरं पदं, यो ह वै नारायणस्याष्टाक्षरं पदमध्येति, अनपब्रुव: सर्वमायुरेति, विन्दते प्राजापत्यं रायस्पोष गोपत्यं ततोऽमृतत्वमश्नुते इति, य एवं वेद, इत्युपनिषत् ।(सा.वे. शिरसि नारायणोपनिषत् )
अथात: समयाचारिकान् धर्मान् व्याख्यास्यामः । धर्मज्ञसमयः । प्रमाणं वेदाश्च । चत्वारो वर्णा: ब्राह्मण-क्षत्रीय-वैश्य-शूद्रास्तेषां पूर्व: पूर्वो जन्मत: श्रेयान्
(धर्मसूत्र)
अथ कर्माण्याचाराद्यानि गृह्यन्ते । उदगयनपूर्वपक्षाहपुण्याहेषु कार्याणि यज्ञोपवीतिना प्रदक्षिणम् । (गृहसूत्रम्)
अथातो धर्मजिज्ञासा । अथातो ब्रह्मजिज्ञासा।
(‘जै.व्या.’ सूत्र पू.उ. मीमांसा)
विशेष मन्त्र पुष्प – ३
नमस्तस्मै वराहाय लीलयोद्धरते महीम् ।
खुरमध्यगतो यस्य मेरु: कनकणायते ॥( वराहपुराण )
इच्छामो हि महाबाहुं रघुवीरं महाबलम् ।
गजेन महतायान्तं रामं छत्रावृताननम् ॥२॥
तं दृष्ट्वा शत्रुहन्तारं महर्षीणां सुखावहम् ।
बभूव हृष्टा वैदेही भर्तारं परिषस्वजे ॥(वा . रामायण )
तमद्भुतं बालकमम्बुजेक्षणं चतुर्भुजं शङ्खगदाधुदायुधम् ।
श्रीवत्सलक्ष्मं गलशोभि-कौस्तुभं पीताम्बरं सान्द्रपयोदसौभगम्महार्हवैडुर्यकिरीटकुण्डलत्विषा परिष्वक्तसहस्रकुन्तलम् ।
उद्दामकांच्यंगदकङ्कणादिभिर्विरोचमानं वसुदेव ऐक्षत ॥५॥

      तासामाविरभूच्छौरि: स्मयमानमुखम्बुजः। 
जमाल पीताम्बरधरः स्रग्वी साक्षान्मन्मथमन्मथ: ॥६॥
                                                                 (श्रीमद्भागवत)

एष नारायण: श्रीमान् क्षीरार्णवनिकेतनः ।
नागपर्यंकमुत्सृज्य ह्यागतो मथाम्प्रीम् ॥७॥
अहो वीर्यमहो शौर्यमहो बाहुपराक्रमम् ।
नारसिंहं परं दैवमहो बलमहो बलम् ॥८॥
वैकुण्ठे तु परे लोके श्रिया सार्द्ध जगत्पति: ।
आस्ते विष्णुरचिन्त्यात्मा भक्तैर्भागवतै: सह ॥९॥

मायावी परमानन्दं त्यक्त्वा वैकुण्ठमुत्तमम् ।
स्वामिपुष्करिणीतीरे रमया सह मोदते ॥१०॥
मुक्तिदश्च मुमुक्षूणां सर्वेषां सर्वकामदः ।

क्रीडार्थ लोकरक्षार्थं वसाम्यत्र श्रिया सह ॥११॥
वेङ्कटाद्रिसमं स्थानं ब्रह्माण्डे नास्ति किंचन ।
वेङ्कटेशसमो देवो न भूतो न भविष्यति ।१२॥
                                               (वेङ्कटेश माहात्म्य)
वपापरिमलोल्लासवासिताधरपल्लवम्
मुखं वरदराजस्य मुग्धस्मितमुपास्महे ॥१॥
                                          (श्रीहस्तिगिरि माहात्म्य)
फाल्गुने मासि पूर्णायामुत्तरद्धेन्दुवासरे।

गोविन्दराजो भगवान् प्रादुरासीन्महामुनिः ॥१४॥
कदा पुनः शंखरथाङ्गकल्पकध्वजारविन्दाङ्कुशवज्रलाञ्छनम् ।
त्रिविक्रम ! त्वच्चरणाम्बुजद्वयं मदीयमूर्धानमलङ्करिष्यति ॥१५॥
                                                                    (स्तोत्ररत्न)
कस्तूरी कलितोर्ध्वपुण्ड्रतिलकं कर्णान्तलोलेक्षणं

         मुग्धस्मेरमनोहराधरदलं मुक्ताकिरीटोज्ज्वलम् ।
पश्यन्मानसपश्यतोहररुचिं पर्यायपंकेरुहं
श्रीरङ्गाधिपते: कदा नु वदनं सेवेय भूयोऽप्यहम् ॥१६॥

                                                    (श्रीरङ्गनाथ स्तोत्रम्)
अखिल – भुवन – जन्म – स्थेमभङ्गादिलीले

           विनतविविधभूतवातरक्षकदीक्षे।
श्रुति – शिरसि विदीप्ते ब्रह्मणि श्रीनिवासे,

          भवतु मम परस्मिन् शेमुषी भक्तिरूपा ॥१७॥
पाराशर्यवचस्स धामपनिषदुग्धाब्धिमध्योद्धृतां
         संसाराग्निविदीपनव्यपगतप्राणात्मसञ्जीवनीम् ।
पूर्वाचार्यसुरक्षिता बहुमतिव्याघातदूरस्थितां
आनीतान्तु निजाक्षरैस्सुमनसो भौमा: पिवन्त्वन्वहम् ॥१८॥
(श्रीभाष्य)

 पितेव त्वत्प्रेयान् जननि परिपूर्णागसि जने
           हितस्रोतोवृत्त्या भवति च कदाचित् कलुषधीः ।
किमेतन्निर्दोषः क इह जगतीति त्वमुचितै:
उपायैर्विस्मार्य स्वजनयसि माता तदसि नः ॥१९॥

                                                             (श्रीगुणरत्नकोश:)
जयति सकलविद्यावाहिनीजन्मशैल:

                जनिपथपरिवृत्तिश्रान्तविश्रान्तिशाखी ।
निखिलकुमतिमायाशर्वरीवालसूर्य:
निगमजलधिवेलापूर्णचन्द्रो यतीन्द्रः ॥२०॥
                                                               (य. सप्तति)

नम: प्रणवशोभितं नवकषायखण्डाम्बरं
          त्रिदण्डपरिमण्डितं त्रिविधतत्त्वनिर्वाहकम् ।
दयांचितदृगंचलं दलितवादिवाग्वैभवं

           शमादिगुणसागरं शरणमेमि रामानुजम् ॥२१॥
                                                                     (मुक्तकम्)

गृहाप उपवीतिनमूर्ध्वपुण्ड्रवन्तं त्रिजगत्पुण्यफलं त्रिदण्डहस्तम् ।
शरणागतसार्थवाहमीडे शिखया शेखरिणं पतिं यतीनाम् ॥२२॥ 

सुशङ्खचक्रलाञ्छनस्सदूर्ध्वपुण्ड्रमण्डित –
          सुकण्ठलग्नसत्तुलस्यनर्घपद्यमालिका।
सितान्तरीसोत्तरीय यज्ञसूत्रशोभितो

            ममाविरस्तुमानसेगुरूस्तु वेङ्कटेश्वरः ॥२३॥
नमज्जनस्य चित्त भित्ति भक्ति-चित्र-तूलिका
भवाहिवीर्यभञ्जने नरेन्द्रमन्त्रयन्त्रणा।
प्रपन्नलोककैरवप्रसन्नचारुचन्द्रिका
शठारिहस्तमुद्रिका हठात् धुनातु व तम: ॥२४॥

                                                     (वकुलाभरणाष्टक )
भरताय परं नमोऽस्तु तस्मै प्रथमोदाहरणाय भक्तिभाजाम् ।
यदपज्ञमशेषत: पृथिव्यां प्रथितो राघवपादुकाप्रभाव: ॥२५॥
(पादुका सहस्रम्)
  नाहं विप्रो न च नरपतिर्नैव वैश्या न शूद्रो
नो वा वर्णी न च गृहपतिर्नो वनस्थो यतिर्वा ।
किन्तु प्रोद्यन्निखिलपरमानन्दपूर्णामृताब्धे

         लक्ष्मीभर्तुःपदकमलयोर्दासदासानुदासः ॥२६॥
श्रीनगर्या महापूर्यम्रपर्युत्तरेतटे ।
श्रीतिंत्रिणीमूलधाम्नि (श्री) शठकोपाय मङ्गलम् ॥२७॥
                                                                    (मङ्गलाष्टक)

सुगन्धवल्ली शतपत्रजाती सुवर्णचम्पावकुलोद्भवानि ।
ककम्) गृहाण देवेश मयार्पितानि प्रभो ! हरे ! श्रीतुलसीदलानि ॥

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