निष्क्रमण संस्कार

यह संस्कार वास्तव में हिन्दू धर्म की एक महत्वपूर्ण परंपरा है जो शिशु के शारीरिक और मानसिक विकास को ध्यान में रखकर किया जाता है। आइए इस संस्कार की मुख्य बातें और विधि पर एक संक्षिप्त नजर डालें:

निष्क्रमण संस्कार का महत्व
आयु वृद्धि:
निष्क्रमण संस्कार का मुख्य उद्देश्य शिशु की आयु वृद्धि के लिए किया जाता है। यह संस्कार शिशु को सूरज और चंद्रमा की ऊर्जा के संपर्क में लाकर उसकी स्वास्थ्य और जीवन की लंबाई बढ़ाने की कामना करता है।
पंचतत्वों का सामांजस्य:
हमारे शरीर का निर्माण पंचतत्व (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) से हुआ है। निष्क्रमण संस्कार इन तत्वों के सामांजस्य को बनाए रखने में मदद करता है। इससे शिशु के शरीर की भौतिक और मानसिक स्थिति सही रहती है।
निष्क्रमण संस्कार कब किया जाता है?
समय:
यह संस्कार शिशु के जन्म के चौथे या छठे महीने में किया जाता है। इस अवधि में शिशु का शरीर बाहरी पर्यावरण को सहन करने के लिए तैयार होता है।
स्वास्थ्य की स्थिति:
संस्कार के समय शिशु को घर से बाहर ले जाकर सूर्य और चंद्रमा की ज्योति दिखाने का विधान है। यह सुनिश्चित करने के लिए कि शिशु शारीरिक रूप से स्वस्थ है और उसकी इंद्रियां ठीक से काम कर रही हैं, यह संस्कार किया जाता है।

निष्क्रमण संस्कार की विधि

बालकस्य पिता शुभ मुहूर्ते  कृतनित्यक्रियः हस्तौ पादौ प्रक्षाल्य पूजास्थानमागत्य आचम्य
प्राणानायम्य कर्मपात्रं कृत्वा कुशत्रयसहितं कर्मपात्रोदकेनाभिषिच्य प्रतिज्ञासङ्कल्पं कुर्यात् –

संकल्प 
ॐ अद्येत्यादि देशकालौ स्मृत्वा (अमुक)गोत्रस्य (अमुक)शर्मणः/वर्मणः/गुप्तस्य/दासस्य
अहं मम बालकस्य आयुरारोग्याभिवृद्धिव्यवहारसिद्धिद्वारा
श्रीमत्परमेश्वरप्रीत्यर्थं निष्क्रमण संस्कारामहं करिष्ये  ।
संकल्प करके अग्निस्थापना विधि से अग्नि स्थापन कर
ततोऽग्निं यथाविधि स्थापयेत् –

दीपप्रज्वाल्य दीपं पूजयेत्

दीपो ज्योति परमब्रह्म दीपो ज्योतिर्जनार्दनः।
दीपो हरतु मे पापं सन्ध्यादीप नमोस्तुते॥
नमोस्त्वनन्ताय सहस्रमूर्तये सहस्रपादाक्षिशिरोरुबाहवे
सहस्रनाम्ने पुरुषाय शाश्वते सहस्रकोटि युगाधारिणे नम : ।गणेश को स्थापना कर

गणेशं संपूजनम् 

ध्यानम्
अक्षत पुष्प लेकर गौरी-गणेश का ध्यान करें :-
आवाहन आदि षोडषोपचार से पूजन करे
ॐ गणानान्त्वा गणपति गूं हवामहे प्रियाणान्त्वा प्रियपति गूं हवामहे निधीनान्त्वा निधिपति गूं हवामहे व्वसो मम।
आहमाजानि गर्ब्भधमात्वमजासि गर्ब्भधम्॥

ॐ भू र्भुवः स्वः सिद्धि बुद्धि सहिताय श्रीमन्महा गणाधिपतये नमः आवाहनादि षोडशोपचारं समर्पर्यामि – अर्घ्यादि से निराजनान्त पूजन करे ।

अग्निस्थापनविधिना वनस्पत्यन्तहवनम्
पञ्चभूसंस्कारादिस्थण्डिलसंस्काराः, अग्निसंस्कारः, ब्रह्मोपवेशनम्, ब्रह्मवरणम्, पात्रासादनम्,
ब्राह्मणवरणम्, पुण्याहवाचनम्, दीपकलशगणेशपूजनम्, होमसङ्कल्पः, आघाराज्यभाग–
महाव्याहृतिहोमपूर्वकं पञ्चवारुणिहोमं, गणपत्यादिवनस्पत्यन्तहोमञ्च, अग्निस्थापनपद्धतिमनुसृत्य यथाविधि सम्पादयेत्।

शुभ सुर्योदय से कुचः समय पूर्व  एक जल से भरा पात्र लें जिसमें रोली, गुड़, और लाल पुष्प की पंखुड़ियां डालें।
इस जल से सूर्यदेव को ॐ आकृष्णेन ……. से अर्घ्य दें और सूर्यदेव का आह्वान करें ताकि शिशु को आशीर्वाद मिल सके।
सुर्योदय के शीतल सूर्यदेव का दर्शन निम्न मन्त्र से कराये ,
तच्चक्षुर्देवहितं पुरस्ताच्छुक्रमुच्चरत्।
पश्येम शरदः शतं, श्रृणुयाम शरदः शतं,
प्रब्रवाम शरदः शतमदीनाः स्याम,
शरदः शतं , भूयश्च शरदः शतात् ।

पूजा और आशीर्वाद:

सूर्यदेवता, गणेश , त्रिदेव, लक्ष्मी, सरस्वती, दुर्गा, गाय, पितर, ब्राह्मण, देवालय, तुलसी, पीपल का वृक्ष, प्रकृति और कुलदेवताओं को प्रार्थना करे और दर्शन काराये ।
लाल बैल को सवा किलो गेहूं और सवा किलो गुड़ खिलाएं।

चंद्रमा के दर्शन:
सूर्यास्त के समय सूर्यदेव को प्रणाम करें और रात मे चंद्रमा के दर्शन कराएं।
चंद्रमा को भी इसी प्रकार पूजें।
मंत्र का उपयोग:
चन्द्रमा को गन्धाक्षत पुष्प से निम्न लिखित मन्त्र बोलकर पूजन करे
शिवे ते स्तां द्यावापृथिवी असंतापे अभिश्रियौ ।
शं ते सूर्य आ तपतु शं वातो वातु ते हृदे ।
शिवा अभि क्षरन्तु त्वापो दिव्याः पयस्वतीः ॥ १४॥
इसका अर्थ है कि शिशु के लिए सूर्य का प्रकाश कल्याणकारी हो, शिशु के हृदय में स्वच्छ वायु का संचार हो, और पवित्र जल शिशु के कल्याण में सहायक हो।
निष्कर्ष
निष्क्रमण संस्कार न केवल शिशु के स्वास्थ्य और दीर्घकालिक जीवन की कामना करता है, बल्कि उसे सामाजिक और धार्मिक रूप से भी सशक्त बनाता है। यह संस्कार शिशु को बाहरी दुनिया के संपर्क में लाकर उसकी संवेदी और शारीरिक क्षमताओं को विकसित करने में मदद करता है।

इस संस्कार के माध्यम से शिशु को जीवन के विभिन्न पहलुओं का अनुभव कराया जाता है और उसकी समृद्धि की कामना की जाती है।

उत्तराङ्गकर्म
ततश्चतुःस्वस्त्यादिपूर्णाहुतिहोमान्तमवशिष्टहोमं समाप्य पूर्णपात्रम्, मेधाहोमः, शेषचरुहोमः,
गोदानम्, दक्षिणासङ्कल्पश्चेत्यादि सर्वमुत्तराङ्गकर्म अग्निस्थापनपद्धतिमाश्रित्य समापयेत्।

दक्षिणादानम्
अद्येहामुकोऽहं जातस्य शिशोः कृतैतज्जातकर्मणः साङ्गतायै साद्गुण्यार्थं च इमां दक्षिणां
नानानामगोत्रेभ्यो ब्राह्मणेभ्यो विभज्य दास्ये। ततो भूयसीं सङ्कल्प्य ब्राह्मणेभ्यो दद्यात्।

आवाहित देवानां अक्षता से  विसर्जन करे
ॐ गच्छ गच्छ सुरश्रेष्ठ, स्वस्थाने परमेश्वर
यत्र ब्रह्मादयो देवाः, तत्र गच्छ हुताशन ॥

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