समावर्तन संस्कार

पारस्कर-गृह्यसूत्र के अनुसार समावर्तन-संस्कार में भी वेदारम्भ एवं उपनयन-संस्कार में विहित अधिकांश विधियों को पुनरावर्तित किया जाता है। वेदाध्ययन पूर्ण कर ब्रह्मचारी अपने ब्रह्मचर्य व्रत की सम्पूर्ति करता है तथा द्वितीय आश्रम में जाने के लिये गुरु से अनुमति चाहता है। गृह्यसूत्रों में ब्रह्मचर्य व्रतनिवर्तक कर्म को ही समावर्तन शब्द से कहा गया है। इसमें ब्रह्मचारी स्नान करने की प्रार्थना अपने आचार्य से करता है तथा उनकी आज्ञा प्राप्त होने पर वैश्वानर नामक अग्नि की स्थापना ‘पञ्चभू’ संस्कार के द्वारा करके कुशकण्डिका के द्वारा होम-विधि सम्पन्न करता है। तदनन्तर अग्नि-परिसमूहन एवं समिदाधान करके अङ्ग- प्रोक्षण, भस्म-धारण तथा देवता, गुरु का अभिवादन करता है, तदनन्तर आठ प्रतिष्ठित कुम्भों के जल से अपने शिर पर अभिषेक करता है, इसके बाद मेखला, दण्ड, मृगचर्म का मन्त्रपूर्वक परित्याग कर सूर्योपस्थान करता है तथा अपने शरीर को विविध वस्त्रालंकारों से विभूषित कर गृहस्थ धर्म के अनुसार शास्त्रोक्त विधियों का परिपालन करता है। आचार्य उसे गृहस्थ धर्म का उपदेश करते हैं। इन सारी विधियों का प्रयोग निम्नलिखित रूप में किया जाता है।

समावर्तन  संस्कारविधिः
ब्रह्मचारी- ‘अमुकगोत्रः अमुकशर्मा स्नानाधिकारसिद्धये गोनिष्क्रयभूतं सुवर्णं रजतं वा आचार्याय तुभ्यमहं सम्प्रददे’

इति गुरवे प्रदाय ‘भो गुरो स्नास्यामि’ इति सम्प्रार्थ्य ‘स्नाहि’ इत्यनुज्ञातः समावर्तनं कुर्यात्।

निर्देश- आचार्य समावर्तन संस्कार के निमित्त अलग वेदी का निर्माण कराकर, पूर्वाभिमुख बैठकर अपने दक्षिण की ओर उत्तराभिमुख ब्रह्मचारी को बैठाकर गणेशादि समस्त आवाहित देवताओं का पूजन कर पञ्चभूसंस्कारपूर्वक वैश्वानर नामक अग्नि की स्थापना करता है।
(पञ्चभूसंस्कार एवं कुशकण्डिका की विधि उपनयन संस्कार में पूर्णरूप से दी गयी है, तदनुसार यहाँ भी सम्पन्न कर लेना चाहिए)।

ततो ब्रह्मवरणस्य सङ्कल्पः
‘अस्य वटोः समावर्तनाङ्गहोमकर्मणि एभिर्वरणद्रव्यैगौत्रममुक- शर्माणं ब्रह्माणं त्वामहं वृणे’ इति वृत्वा-
यथा चतुर्मुखो ब्रह्मा सर्ववेदधरः प्रभुः।
तथा त्वं मम यज्ञेऽस्मिन् ब्रह्मा भव द्विजोत्तम ॥
इति प्रार्थयेत् ।

उपनयनवत् कुशकण्डिकां कृत्वा “वैश्वानरनामाग्ने सुप्रतिष्ठिते वरदो भव” इति प्रतिष्ठाप्य ध्यायेत् पूजयेच्च्च।

तद्यथा- ‘ॐ भूर्भुवः स्वः वैश्वानरनाम्ने अग्नये नमः’।
अग्नि प्रज्वलितं वन्दे जातवेदं हुताशनम्।
सुवर्णवर्णममलमनन्तं विश्वतोमुखम् ॥
सर्वतः पाणिपादश्च सर्वतोऽक्षिशिरोमुखः ।
विश्वरूपो महानग्निः प्रणीतः सर्वकर्मसु ।
ॐ चत्वारि शृङ्गा त्रयो अस्य पादा द्वे शीर्षे सप्त हस्तासो अस्य।
त्रिधा बद्धो वृषभो रोरवीति महो देवो मर्त्या आविवेश ॥
इति मन्त्रैरग्निं सम्पूज्य दक्षिणं जान्वाच्य कुशेन दक्षिणबाहौ ब्रह्मणाऽन्वारब्ध आचान्तो मौनी मूलमध्यभागयोर्मध्येन स्रुवं गृहीत्वा जुहुयात्।

होम-विधिः
ॐ प्रजापतये स्वाहा, इदं प्रजापतये न मम।
(इति मनसो च्चारयेत्)
ॐ इन्द्राय स्वाहा, इदमिन्द्राय न मम।
ॐ अग्नये स्वाहा, इदमग्नये न मम।
ॐ सोमाय स्वाहा, इदं सोमाय न मम।
(अन्वारम्भं त्यक्त्वा यथापूर्व यजुर्वेदाद्याहुतयः होतव्याः)

यजुर्वेदाहुतयः –
ॐ अन्तरिक्षाय स्वाहा, इदमन्तरिक्षाय न मम।
ॐ वायवे स्वाहा, इदं वायवे न मम।
ॐ ब्रह्मणे स्वाहा, इदं ब्रह्मणे न मम।
ॐ छन्दोभ्यः स्वाहा, इदं छन्दोभ्यो न मम।

ऋग्वेदाहुतयः –
ॐ पृथिव्यै स्वाहा, इदं पृथिव्यै न मम।
ॐ अग्नये स्वाहा, इदमग्नये न मम।
ॐ ब्रह्मणे स्वाहा, इदं ब्रह्मणे न मम।
ॐ छन्दोभ्यः स्वाहा, इदं छन्दोभ्यो न मम।

सामवेदाहुतयः –
ॐ दिवे स्वाहा, इदं दिवे न मम।
ॐ सूर्याय स्वाहा, इदं सूर्याय न मम।
ॐ ब्रह्मणे स्वाहा, इदं ब्रह्मणे न मम।

अथर्ववेदाहुतयः-
ॐ दिग्भ्यः स्वाहा, इदं दिग्भ्यो न मम।
ॐ चन्द्रमसे स्वाहा, इदं चन्द्रमसे न मम।
ॐ ब्रह्मणे स्वाहा, इदं ब्रह्मणे न मम।
ॐ छन्दोभ्यः स्वाहा, इदं छन्दोभ्यो न मम।

सामान्याहुतयः 
ॐ प्रजापतये स्वाहा, इदं प्रजापतये न मम।
ॐ देवेभ्यः स्वाहा, इदं देवेभ्यो न मम।
ॐ ऋषिभ्यः स्वाहा, इदं ऋषिभ्यो न मम।
ॐ श्रद्धायै स्वाहा, इदं श्रद्धायै न मम।
ॐ मेधायै स्वाहा, इदं मेधायै न मम।
ॐ सदसस्पतये स्वाहा, इदं सदसस्पतये न मम।
ॐ अनुमतये स्वाहा, इदमनुमतये न मम।

पुन ब्रह्मणाऽन्वारब्धः –
ॐ भूः स्वाहा, इदमग्नये न मम।
ॐ भुवः स्वाहा, इदं वायवे न मम।
ॐ स्वः स्वाहा, इदं सूर्याय न मम।

ॐ त्वन्नो अग्ने वरुणस्य विद्वान् देवस्य हेडो अव यासिसीष्ठाः।
यजिष्ठो वह्नितमः शोशुचानो विश्वा प्रमुमुग्ध्यस्मत्स्वाहा॥
इदमग्निवरुणाभ्यां न मम।
द्वेषासि

ॐ स त्वन्नो अग्नेऽवमो भवोती नेदिष्ठोऽअस्या उषसो व्युष्टौ।
अव यक्ष्व नो वरुण रराणो व्ब्रीहि मृडीक सुहवो न एधि स्वाहा॥
इदमग्निवरुणाभ्यां न मम।
ॐ अयाश्चाग्नेऽस्यनभिशस्तिपाश्च सत्यमित्वमया असि।
अया नो यज्ञं वहास्यया नो धेहि भेषजः स्वाहा॥
इदमग्नये अयसे न मम।
ॐ ये ते शतं वरुण ये सहस्रं यज्ञियाः पाशा वितता महान्तः।
तेभिर्नो अद्य सवितोत विष्णुर्विश्वे मुञ्चन्तु मरुतः स्वर्काः स्वाहा॥

इदं वरुणाय सवित्रे विष्णवे विश्वेभ्यो देवेभ्यो मरुद्भयः स्वर्केभ्यश्च न मम।
ॐ उदुत्तमं वरुण पाशमस्मदवाधमं विमध्यमः श्रथाय।
अथा वयमादित्यव्रते तवानागसो अदितये स्याम स्वाहा॥
इदं वरुणायादित्यायादितये न मम।
ॐ प्रजापतये स्वाहा, इदं प्रजापतये न मम।
ॐ अग्नये स्विष्टकृते स्वाहा, इदमग्नये स्विष्टकृते न मम।
संस्रवप्राशनम्। मार्जनम्। अग्नौ पवित्रप्रतिपत्तिः। प्रणीताविमोकः।

ब्रह्मणे पूर्णपात्रदानम्।

तत्र सङ्कल्पः
वटुः – ‘अमुकगोत्रः अमुकशर्मा कृतस्य समावर्तनाङ्गहोमकर्मणः साद्गुण्यप्राप्तये अपूर्णपूरणार्थमिदं पूर्णपात्रं प्रजापतिदैवतं यथानामगोत्राय ब्राह्मणाय तुभ्यमहं सम्प्रददे’ ।

अग्नि-परिचर्या
ततः अग्नौ पञ्चशुष्कगोमयखण्डानि मन्त्रपूर्वकं क्षिपेत्।

तद्यथा मन्त्रः-
ॐ अग्ने सुश्रवः सुश्रवसं मा कुरु ॥ १ ॥
ॐ यथा त्वमग्ने सुश्रवः सुश्रवा असि ॥ २॥
ॐ एवं मा सुश्रवः सौश्रवसं कुरु ॥ ३॥
ॐ यथा त्वमग्ने देवानां यज्ञस्य निधिपः असि ॥ ४॥
ॐ एवमहं मनुष्याणां वेदस्य निधिपो भूयासम् ॥ ५॥
निर्देश- इसके बाद जल से प्रादक्षिण्यवृत्ति से अग्नि का पर्युक्षण कर निम्नलिखित ‘अग्नये समिध.’ मन्त्र से एक-एक करके घृताक्त तीन समिधाओं की अग्नि में आहुति के अनन्तर पुनः उपरिलिखित ‘अग्ने सुश्रवः’ इत्यादि पाँच मन्त्रों से अग्नि का परिसमूहन एवं पर्युक्षण करके मौन रहते हुए दोनों हाथों को अग्नि में तपाकर मुख पोंछे। तद्यथा-

समिदाधानमन्त्रः
समावर्तन-संस्कार-प्रयोग
अग्नये समिधमाहार्यं बृहते जातवेदसे यथा त्वमग्ने समिधा समिध्यस एवमहमायुषा मेधया वर्चसा प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन समिन्धे जीवपुत्रो ममाचार्यो मेधाव्यहमसान्यनिराकरिष्णुर्यशस्वी तेजस्वी ब्रह्मवर्चस्यन्नादो भूयासः स्वाहा॥

अग्निपरिसमूहन-मन्त्राः
ॐ ‘अग्ने सुश्रवः सुश्रवसं मा कुरु’।
ॐ यथा त्वमग्ने सुश्रवः सुश्रवा असि।
ॐ एवं मा सुश्रवः सौश्रवर्स कुरु।
ॐ यथा त्वमग्ने देवानां यज्ञस्य निधिपः असि ।
ॐ एवमहं मनुष्याणां वेदस्य निधिपो भूयासम्।

मुखप्रोक्षणमन्त्राः 
ॐ तनूपा अग्नेऽसि तन्वं मे पाहि॥१॥
ॐॐ आयुर्दा अग्नेऽस्यायुर्मे देहि॥२॥
ॐ वर्योदा अग्नेऽसि वर्ची मे देहि ॥३॥
ॐ अग्ने यन्मे तन्वा ऊनं तन्म आपृण ॥४॥
ॐ मेधाम्मे देव सविता आदधातु ॥५॥
ॐ मेधाम्मे देवी सरस्वती आदधातु ॥६॥
ॐ मेधामश्विनी देवावाधत्तां पुष्करस्त्रजौ ॥७॥

अङ्गस्पर्शनमन्त्राः
‘ॐ अङ्गानि च म आप्यायन्ताम्’ (इति शिरसः आपादमङ्गानि स्पृशति)।
‘ॐ वाक् च म आप्यायताम्’ (इति मुखम्)।
‘ॐ प्राणश्च म आप्यायताम्’ (इति नासारन्ध्र)।

समिदाधानमन्त्रः
‘ॐ चक्षुश्च म आप्यायताम्’ (इति चक्षुषी युगपत्)।
‘ॐ श्रोत्रं च म आप्यायताम्’ (इति दक्षवामश्रोत्रे)।
‘ॐ यशोबलं च म आप्यायताम्’ (इति परस्परव्यत्यासेन बाह युगपत् स्पृशेत्)।

भस्मधारणमन्त्रा:
‘ॐ त्र्यायुषं जमदग्नेः’ इति ललाटे।
‘ॐ कश्यपस्य त्र्यायुषम्’ इति ग्रीवायाम्।
‘ॐ यद्देवेषु त्र्यायुषम्’ इति दक्षिणबाहुमूले।
‘ॐ तन्नो अस्तु त्र्यायुषम्’ इति हृदि’।

निर्देश- इसके अनन्तर ब्रह्मचारी अग्नि एवं गुरु को व्यत्यस्त पाणि से अभिवादन करता है।
अमुकगोत्रोऽ मुकप्रवरोऽ मुकशाखाध्यायी अमुकशर्माऽहं भो अग्ने! त्वामभिवादये।
पुनः अमुकगोत्रोऽ मुकप्रवरोऽमुकशाखाध्यायी अमुकशर्माऽहं भो गुरो ! त्वामभिवादये।
आचार्यः ‘आयुष्मान् भव सौम्य अमुकशर्मन्’।

अभिषेक-विधिः
निर्देश- पूर्व से दक्षिणोत्तर क्रम से स्थापित आठ कलशों से जल लेकर ब्रह्मचारी मन्त्रपूर्वक अपने शिर पर अभिषेचन करता है।
उदङ्मुख बैठकर दक्षिण से एक-एक कलश का जल निकाल कर अभिसिञ्चन करता है।

प्रथमकुम्भाद् जलग्रहणमन्त्रः
ॐ येऽप्स्वन्तरग्नयः प्रविष्ठ गोह्य उपगोह्यो मयूखो।  
मनोहाऽस्खलो विरुजस्तनूदुषिरिन्द्रियहा तान्  विजहामि  यो रोचनस्तमिह गृह्णामि॥
१. ऊपर लिखे समस्त मन्त्रों का अर्थ उपनयन प्रकरण में दिया गया है।

समावर्तन-संस्कारप्रयोग
मनोहाऽस्खलो विरुजस्तनूदपुरिन्द्रिय हा तान्बिजहामि यो रोचनस्तमिह गृह्मणेमि ॥
मन्त्रार्थ जल में दस प्रकार की अग्नियाँ निवास करती है, जिनमे गोह्य, उपगोह्य, मयूख, मनोहर, खल, विरुज, तनु, दूषु इन आठ प्रकार की अग्नियों का परित्याग कर मैं रोचन एवं कल्याण नामक दोनों अग्नियों सहित जल को स्नान करने के लिए ग्रहण करता हूँ।

सिञ्चन-मन्त्रः
ॐ तेन मामभिषिञ्चामि श्रियै यशसे ब्रह्मणे ब्रह्मवर्चसाय ॥ (इति स्वशिरसि अभिषिञ्चेत्)

मन्त्रार्थ-इस जल से लक्ष्मी-लाभ, यशोलाभ, ब्रह्मतेज-लाभ तथा ब्रह्मज्ञान प्राप्त हो, इसलिए मैं आत्मसिञ्चन करता हूँ।
द्वितीयकुम्भात्-
ॐ येऽप्स्वन्तरग्नयः.‘ इस पूर्वोक्त मन्त्र से जल ग्रहण करे।

सिञ्चन-मन्त्रः
ॐ येन श्रियमकृणुतां येनावमृशताः सुराम्।
येनाक्ष्यावभ्यषिञ्चतो यद्वां तद‌श्विना यशः ॥

मन्त्रार्थ-जिस जल से अश्विनीकुमार लक्ष्मीवान् हुए, जिस जल से मदिरोत्पन्न दोष दूर किये गये और जिस जल से नेत्रों का सिञ्चन किया गया, उसी जल से मैं अपनी आत्मा का सिञ्चन करता हूँ।
तृतीयकुम्भाद् जलग्रहणमन्त्रः
ॐ येऽप्स्वन्तरग्नयः प्रविष्ठ गोह्य उपगोह्यो मयूखो।  
मनोहाऽस्खलो विरुजस्तनूदुषिरिन्द्रियहा तान्  विजहामि  यो रोचनस्तमिह गृह्णामि॥
(पूर्वोक्त मन्त्र से जल ग्रहण करें)।

अभिषेकमन्त्रः- ॐ आपो हिष्ठा मयोभुवस्ता न ऊर्जे दधातन। महे रणाय चक्षसे॥
(इति शिरसि सिञ्चेत्)

चतुर्थकुम्भात्-
‘ॐ येऽप्स्वन्तरग्नयः’ इति मन्त्रेण जलमादाय

ॐ यो वः शिवतमो रसस्तस्य भाजयतेह नः ।
उशतीरिव मातरः ॥
इति मन्त्रेण शिरसि अभिषिञ्ज्ञेत्।

पञ्चमकुम्भात्
ॐ येऽप्स्वन्तरग्नयः प्रविष्ठ गोह्य उपगोह्यो मयूखो।  
मनोहाऽस्खलो विरुजस्तनूदुषिरिन्द्रियहा तान्  विजहामि  यो रोचनस्तमिह गृह्णामि॥
इति मन्त्रेण जलमादाय

ॐ तस्मा अरङ्गमामवो यस्य क्षयाय जिन्वथ।
आपो जनयथा च नः ॥
इति मन्त्रेण अभिषिज्ञेत् ॥ ततः षष्ठात्, सप्तमात्, अष्टमाच्च कुम्भात् क्रमेण मन्त्रावृत्त्या
ॐ येऽप्स्वन्तरग्नयः‘ इति अपो गृहीत्वा तूष्णी स्वशिरसि अभिषिञ्चेत्।

ततो ब्रह्मचारी ‘ॐ उदुत्तमम्’ इति मन्त्रं पठन् शिरोमार्गेण मेखलां निस्सारयेत्।

ॐ उदुत्तमं वरुण पाशमस्मदवाऽधर्म मध्यमः श्रथाय।
अथा व्वयमादित्यन्नते तवानागसो अदितये स्याम स्वाहा॥

निर्देश- उक्त मन्त्र से मेखला को शिरोमार्ग से निकालने के बाद ब्रह्मचारी अपने पलाश-दण्ड को उत्तराग्र भूमि पर रख दे, तथा मृगचर्म को चुपचाप उत्तार कर अन्य कोई वस्त्र उत्तरीय के रूप में धारण कर दोनों बाहुओं को ऊपर उठाकर सूर्य का उपस्थान करे।

तद्यथा मन्त्रः-
ॐ उद्यन् भ्राजभृष्णुरिन्द्रो मरुद्भिस्स्थात्प्रातर्यावभिरस्थात् दशसनिरसि दशसनिं मा कुर्वा विदन्मागमयोद्यन् भ्राजभृष्णुरिन्द्रो मरुद्भिरस्थात् दिवा यावभिरस्थाच्छत सनिरसि शतसनिं मा कुर्वा विदन् मा गमय, उद्यन् भ्राजभृष्णुरिन्द्रो मरुद्भिरस्थात् सायं यावभिरस्थात् सहस्त्रसनिरसि सहस्त्रसनिं मा कुर्वा विदन्मा गमय ॥
मन्त्रार्थ – अपने समस्त मरुत् देवताओं के साथ प्रातःकाल उदित होते हुए हे आदित्य ! जैसे तुम दस गुने किरणों को धारण करते हो, उसी प्रकार मुझे भी दस गुने तेज से युक्त करो तथा मुझे ब्रह्मचर्य से उत्तीर्ण जानो। इसी प्रकार हे आदित्य ! मध्याह्न एवं सायंकाल क्रमशः शत एवं सहस्त्र गुने किरणों से देदीप्यमान होते हो, अतः मुझे भी शत एवं सहस्र गुने तेज से युक्त करो, तथा मुझे ब्रह्मचर्य से उत्तीर्ण जानो।

निर्देश- सूर्योपस्थान के बाद ब्रह्मचारी दधि अथवा तिल खाकर शिखा के अतिरिक्त समस्त केश का मुण्डन कराकर, नखादि कटाकर द्वादश अंगुल परिमित औदुम्बर काष्ठ का दन्तधावन करे।

तत्र मन्त्रः-
ॐ अन्नाद्याय व्यूहध्वः सोमो राजाऽयमागमत्।
स मे मुखं प्रमार्थ्यते यशसा च भगेन च ॥
मन्त्रार्थ- हे औदुम्बर, तुम्हें ग्रहण कर मैंने तुम्हारे अधिपति चन्द्र को मानो ग्रहण कर लिया है, अब वह ओषधियों का स्वामी राजा सोम मेरे अन्न खाने योग्य मुख को यश एवं ऐश्वर्य से प्रच्छालित कर देदीप्यमान कर दे।

निर्देश-दन्तधावन कर ब्रह्मचारी बारह बार जल से कुल्ला कर सुगन्धित तेल से युक्त बटन आदि से शरीरोद्वर्तन कर शीतोष्ण जल से स्नान करता है तथा नूतन वस्त्रादि पहनकर चन्दनादि का अनुलेपन कर नासिका, नेत्र और श्रोत्र का मन्त्रपूर्वक स्पर्श करता है,

तद्यथा-
ॐ प्राणापानी मे तर्पय‘ इति नासिके युगपत् ।
ॐ चक्षुर्मे तर्पय‘ इति चक्षुषी युगपत् ।
ॐ श्रोत्रं मे तर्पय‘ इति श्रोत्रे युगपत् स्पृशति ।
तदुपरान्त ब्रह्मचारी दोनों हाथों को प्रच्छालित कर अपसव्य होकर प्राङ्मुख रहते हुए दक्षिण दिशा में भूमि पर पितरों के निमित्त अवनेजन (जलाञ्जलि) छोड़े, निम्न श्रुतिवाक्य से-
ॐ पितरः शुन्धध्वम्‘।
मन्त्रार्थ- हे पितृगण! मुझे शुद्ध करो। तदनन्तर सव्य होकर आचमन करे, चन्दन से तिलक कर सविता देवता की निम्न मन्त्र से प्रार्थना करे-

ॐ सुचक्षा अहमक्षीभ्यां भूयासं सुवर्चा मुखेन। सुश्रुतकर्णाभ्यां भूयासम् ॥
मन्त्रार्थ- मैं सविता देवता के प्रसाद से आँखों से सुन्दर दिखें तथा कान्तिमान मुख एवं सुनने योग्य कर्णवाला हो जाऊँ।
है उसके बाद नया वस्त्र ब्रह्मचारी पहनता है तथा निम्न मन्त्र बोलता

वस्त्रालङ्कारादिधारणविधिः
ॐ परिधास्यै यशोधास्यै दीर्घायुत्वाय जरदष्टिरस्मि। शतं च जीवामि शरदः पुरूची रायस्पोषं संव्ययिष्ये ॥
मन्त्रार्थ- मैं दीर्घायु के लिए तथा कीर्ति प्राप्त करने के लिए यह वस्त्र पहनता हूँ, मैं इस वस्त्र को धारण करने से सौ वर्ष तक जीवित रहकर अत्यन्त तेजस्वी एवं धनवान् बनूँगा।
निर्देश- तदुपरान्त दो बार आचमन कर ब्रह्मचारी ‘ॐ यज्ञो- पवीतं परमं पवित्रम्’ इत्यादि मन्त्र से द्वितीय यज्ञोपवीत धारण कर पुनः आचमन कर उत्तरीय वस्त्र मन्त्र बोलते हुए धारण करता है। तद्यथा-
ॐ यशसा मा द्यावा पृथिवी यशसेन्द्रा बृहस्पती।
यशो भगश्च माऽविदद् यशा मा प्रतिपद्यताम् ॥
मन्त्रार्थ-आकाश और पृथिवी ये दोनों मुझे यश से परिपूर्ण करें, इन्द्र और बृहस्पति मुझे यश प्रदान करें, जिससे मुझे यश और सौभाग्य प्राप्त हो। पुनः आचमन कर विद्याव्रतस्नातक के रूप में ब्रह्मचारी गृहस्थधर्मानुकूल विभिन्न अलंकरणादि धारण करता है।

पुष्पमाला का ग्रहण एवं धारण मन्त्र-
ॐ या आहरज्जमदग्निः श्रद्धायै मेधायै कामायेन्द्रियाय।
ता अहं प्रतिगृह्णामि यशसा च भगेन च॥

मन्त्रार्थ- जिस पुष्पमाला को महर्षि जमदग्नि ने अपनी अभीष्ट सिद्धि के लिए धारण किया था, उसी पुष्पमाला को यश और सौभाग्य
की प्राप्ति के लिए तथा अपनी चक्षु आदि इन्द्रियों की रक्षा के लिए ग्रहण करता हूँ।

ॐ यद्यशोऽप्सरसामिन्द्रश्चकार विपुलं पृथु।
तेन सङ्ग्रथिताः सुमनस आबध्नामि यशोमयि ॥

मन्त्रार्थ-उर्वशी आदि अप्सरायें जिन मालाओं को धारण करने से अत्यन्त सुन्दर यशवाली हो जाती है. उन्हीं गुंथी हुई पुष्पमालाओं को मैं यश-प्राप्ति के लिए धारण करता हूँ।

इसके बाद पगड़ी धारण मन्त्र-
ॐ युवा सुवासाः परिवीत आगात स उ श्रेयान् भवति जायमानः।
तं धीरासः कवय उन्नयन्ति स्वाध्यो मनसा देवयन्तः ॥

मन्त्रार्थ-जो युवक सुन्दर वस्त्र अपने शिर पर उष्णीष के रूप में धारण करता है, वह सभी पुरुषों में श्रेष्ठ कहा जाता है और श्रेष्ठ वस्त्र को धारण करने वाला सुन्दर पुरुष विद्वानों के द्वारा प्रशंसनीय होता है तथा सभी मनुष्य उसकी प्रशंसा हृदय से करते हैं।

कर्णालङ्कार धारण मन्त्र-
ॐ अलङ्करणमसि भूयोऽलङ्करणं भूयात्।
मन्त्रार्थ- हे कर्णकुण्डल! शोभा को बढ़ाने वाले हो, अतः मेरी शोभा को बढ़ाओ। (पहले दक्षिण कर्ण में, फिर वाम में कुण्डल पहने)।

अञ्जन धारण मन्त्र-
ॐ वृत्रस्यासि कनीनकश्चक्षुर्दा असि चक्षुर्मे देहि ॥
मन्त्रार्थ- हे अञ्जन ! तुम वृत्रासुर के नेत्र के तारा हो, तुम नेत्र की ज्योति को बढ़ाने वाले हो, अतः मेरे भी नेत्र की ज्योति को बढ़ाओ। (दक्षिण-वाम क्रम से लगाये)।

मन्त्र से दर्पण में अपने मुख को देखे-
‘ॐ रोचिष्णुरसि’।
मन्त्रार्थ- हे दर्पण! तुम प्रकाश स्वभाव वाले हो, अतः मुझे भी प्रकाश दो।

निम्न मन्त्र से छत्र (छाता) ग्रहण करे-
ॐ बृहस्पतेश्छदिरसि पाप्मनोमामन्तर्धेहि तेजसो यशसो माऽन्तर्धेहि ॥
मन्त्रार्थ- हे छत्र ! तुम बृहस्पति के आच्छादक हो, उन्हें समस्त पापों से बचाते हो, अतः तुम मुझे भी पापरूपी आतप से बचाओ।

ततः मन्त्र से नवीन जूता पहने –
ॐ प्रतिष्ठे स्थो विश्वतो मा पातम् ।
मन्त्रार्थ- हे उपानह! तुम चलने में कभी थकते नहीं हो, निरन्तर गतिमान् होने के कारण ही तुम्हारी प्रतिष्ठा है, अतः तुम हमारे समस्त गतिरोधों से अर्थात् मार्ग के कण्टक आदि से मेरी रक्षा करो।

ततः नवीन बाँस के दण्डे को ग्रहण करे-
ॐ विश्वाभ्यो मा नाष्ट्राभ्यस्परि पाहि सर्वतः ।
मन्त्रार्थ- हे वेणु-दण्ड! जो जीव काटने तथा डॅसने वाले हैं तथा जो पशु खुर, सींग आदि से मारने वाले हैं, उन सभी से सभी जगह मेरी रक्षा करना।

निर्देश- समावर्तन-संस्कार में स्वस्ति-पुण्याहवाचनादि से ब्राह्मण
को पूर्णपात्र दान पर्यन्त कर्म, पिता अथवा आचार्य करता है तथा आठों कुम्भों के अभिषेक से लेकर वेणु-दण्ड धारण पर्यन्त कर्म ब्रह्मचारी स्वयं मन्त्रपूर्वक करता है। इसके उपरान्त ब्रह्मचारी अपने आचार्य की विधिवत् पूजा कर उन्हें दक्षिणा के रूप में द्रव्यादि के अतिरिक्त गो अथवा तन्निष्क्रय द्रव्य प्रदान करे, तदुपरान्त आचार्य के मुख से स्नातक, गृहस्थ जीवन के लिए पालनीय नियमों को श्रद्धापूर्वक सुने तथा आचार्य को एतदर्थ गोदान का संकल्प करे।
तद्यथा-

‘अमुकगोत्रः अमुकशर्मा मम स्नातकत्वसिद्धये इदं गोनिष्क्रयद्रव्यमाचार्याय दातुमहमुत्सृजे’ इति दद्यात्।

स्नातक के नियम 
स्नातकस्य यमान् वक्ष्यामः (पा.गृ.सू. २.७)
१. कामात् इतरोऽप्यधिक्रियते ।
(द्विजाति के अतिरिक्त भी अपनी इच्छा से अपने कल्याणार्थ इन नियमों का पालन कर सकते हैं)।

२. नृत्यगीतवादित्राणि न कुर्यात्, न च गच्छेत्।
(नाचने, गाने तथा बजाने का काम न स्वयं करे और न ही दूसरों द्वारा अनुष्ठित ऐसे कार्यों में सम्मिलित हो)।

३. क्षेमे रात्रौ ग्रामान्तरं न गच्छेत्, न च धावेत्।
(यदि सब कुछ ठीक हो, तो रात्रि में दूसरे गाँव में न जाय और न अनावश्यक दौड़े)।

४. उदपानाऽवेक्षण-वृक्षारोहण-फलप्रपतन- सन्धिसर्पण-विवृत-स्नान-विषमलङ्घन-शुष्कवदन-सन्ध्याऽऽदित्यप्रेक्षण-भैक्षणानि न कुर्यात्।
(कुएँ में न झाँके, पेड़ पर न चढ़े, कच्चे फल तोड़कर न गिराये, सन्धि वेला में यात्रा न करे, नग्न वदन स्नान न करे, ऊबड़-खाबड़ भूमि को न लाँघे, गन्दी बातें न बोले, सन्ध्या वेला में सूर्यदर्शन न करे, समावर्तन-संस्कार के बाद भिक्षाटन न करे)।

५. वर्षत्यप्रावृतो व्रजेत् ‘ॐ अयं मे वज्रः पाप्मानमपहनत्’ इति मन्त्रं पठन् गच्छेत्।
(यदि वर्षा हो रही हो, तो ‘अयं मे वज्रः’ मन्त्र पढ़ता हुआ विना छाता लगाये ही चले)।
मन्त्रार्थ – यह रविरश्मिसंस्कृत जलकणरूपी वज्र मेरे पापों को नष्ट कर दे।

६. अप्स्वात्मानं नावेक्षेत।
(जल में अपनी परछाई न देखे)।

७. अजातलोम्नीं विपुसीं षण्ढं च नोपहसेत्।
(जिस स्त्री की देह में रोम न हो तथा मुँह में मूँछ दाढ़ी हो और जो पुरुष नपुंसक हो, उसका उपहास न करे)।

८. गर्भिणीं विजन्येति ब्रूयात्।
(गर्भिणी स्त्री को गर्भिणी न कह- कर विजन्या-कल्याणप्रसवा कहे)।

९. सकुलमिति नकुलम्।
(निर्वश पुरुष को न कुल अथवा निर्वश न कहकर सकुल-सवंश कहे)।

१०. भगालमिति कपालम्।
(कपाल को भगाल शब्द से कहे)।

११. मणिधनुरितीन्द्रधनुः ।
(इन्द्रधनुष को मणिधनुष शब्द से कहे)।

१२. गां धयन्तीं परस्मै नाचक्षीत।
(अपने वत्स को दूध पिलाती हुई गाय के बारे में दूसरे से न कहे)।

१३. उर्वरायामनन्तर्हितायां भूमावुत्सर्पस्तिष्ठन्न मूत्रपुरीषे कुर्यात् ।
(उर्वर भूमि या वंजर भूमि पर खड़े होकर या कूद-कूद कर मल- मूत्र का त्याग न करे)।

१४. स्वयं प्रशीर्णेन काष्ठेन गुदं प्रमृजीत।
(अपनेआप पेड़ की डाल से टूट कर गिरी हुई लकड़ी के टुकड़े से गुप्ताङ्ग का परिमार्जन करे)।

१५. विकृतं वासो नाच्छादयीत।
(गन्दे, फटे और अनुपयुक्त वस्त्र न पहने)।

१६. दृढव्रतो वधत्रः स्यात् ।
(निष्ठापूर्वक अपने व्रत-नियम का पालन करे तथा हिंसा से अपनी तथा दूसरों की भी रक्षा करे)।

१७. सर्वतः आत्मानं गोपायेत्।
(सर्वतोभावेन अपनी रक्षा करे)।

१८. सर्वेषां मित्रमिव स्यात्।
(सभी के साथ मित्रवत् व्यवहार करे)।

१९. तिस्रो रात्रीव्रतं चरेत्।
(स्नातक को समावर्तन-संस्कार से तीन दिन तक व्रत रखना चाहिए)।

२०. अमांसाशी, अमृन्मयपायी स्यात्।
(मांस न खाये तथा मिट्टी के बर्तन में पानी न पीये)।

२१. स्त्रीशूद्रशवकृष्णशकुनिशुनां चादर्शनमसम्भाषा च तैः ।
(स्त्री, शूद्र, मुर्दा, कौवा और कुत्ते को न देखे, न इनके साथ बात करे)।

२२. शवशूद्रसूतकान्नानि च नाद्यात्।
(मरणोपरान्त उनके गृह- सम्बन्धियों का, शूद्र का तथा जननाशौच वाले लोगों का अन्न नहीं खाना चाहिए)।

२३. मूत्रपुरीषे ष्ठीवनं चातपे न कुर्यात्।
(धूप में मल-मूत्र का त्याग न करे और न थूके)।

२४. सूर्याच्चात्मानं नान्तर्दधीत।
(सूर्य के प्रकाश से अपने को अलग न करे)।

२५. तप्तेनोदकार्थान् कुर्वीत।
(यथासम्भव गर्म जल से उदकसाध्य शौच, आचमनादि क्रियायें करे)।

२६. अवज्योत्य रात्रौ भोजनम्।
(रात्रि में दीपक जलाकर ही भोजन करे)।

२७. सत्यवदनमेव वा।
(अथवा केवल सदा सत्य बोले)।

निर्देश- आचारात् कतिपय आचार्य पूर्णाहुति करते हैं; परन्तु वह ठीक नहीं है; क्योंकि –
विवाहे व्रतबन्धे च शालायां वास्तुकर्मणि।
गर्भाधानादिसंस्कारे पूर्णाहुतिं न कारयेत्॥

इस वचन से यज्ञोपवीतादि संस्कारों में पूर्णाहुति का निषेध किया गया है। स्नातक नियमों के उपदेश के उपरान्त संस्कार कराने वाले आचार्य को दक्षिणा तथा ब्राह्मण भोजन संकल्प एवं भूयसी दक्षिणा का संकल्प कर अग्न्यादि देवताओं का विसर्जन करे।

तद्यथा-
अमुकगोत्रः अमुकशर्मा कृतस्य समावर्तनकर्मणः साङ्गतासिद्ध्यर्थं कर्मकारयित्रे मनसोद्दिष्टां दक्षिणां तुभ्यमहं सम्प्रददे’ इति दक्षिणां दद्यात्।
पुनः अमुकगोत्रः अमुकशर्मा कृतस्य समावर्तनकर्मणः साद्गुण्यार्थं यथोपपन्नेन सिद्धान्नेन दशसंख्याकान् ब्राह्मणान् भोजयिष्ये।
ततः उपनयन-वेदारम्भ-समावर्तनकर्मसु न्यूनातिरिक्तदोषपरिहारार्थम् इमां भूयसीं दक्षिणां नानानामगोत्रेभ्यो ब्राह्मणेभ्यो दीनानाथेभ्यो विभज्य दातुमहमुत्सृजे । ततोऽग्नेर्नवग्रहादीनाञ्च विसर्जनं कुर्यात्।

तद्यथा-
यान्तु देवगणाः सर्वे पूजामादाय मामकीम्।
इष्टकामसमृद्धयर्थं पुनरागमनाय च ॥
गच्छ गच्छ सुरश्रेष्ठ स्वस्थाने परमेश्वर।
यत्र ब्रह्मादयो देवास्तत्र गच्छ हुताशन ।
प्रमादात् कुर्वतां कर्म प्रच्यवेताऽध्वरेषु यत्।
स्मरणादेव तद्विष्णोः सम्पूर्ण स्यादिति श्रुतिः ॥
यस्य स्मृत्या च नामोक्त्या तपोयज्ञक्रियादिषु।
न्यूनं सम्पूर्णतां याति सद्यो वन्दे तमच्युतम्॥
ॐ विष्णवे नमः, ॐ विष्णवे नमः, ॐ विष्णवे नमः।

॥ इति समावर्तनसंस्कारप्रयोगः ॥

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