श्रीहयग्रीवस्तोत्रम् हिन्दी भाषानुवाद सहित ॥

॥ श्रीहयग्रीवस्तोत्रम् ॥

श्लोक 1–4
श्रीमान्वेङ्कटनाथार्यः कवितार्किककेसरी।
वेदान्ताचार्यवर्यो मे सन्निधत्तां सदा हृदि॥

ज्ञानानन्द मयं देवं निर्मलस्फटिकाकृतिम्।
आधारं सर्वविद्यानां हयग्रीवमुपास्महे॥१॥

स्वतस्सिद्धं शुद्धस्फटिकमणिभूभृत्प्रतिभटं
सुधा सध्रीचीभिद्र्युतिभिरवदातत्रिभुवनम्।
अनन्तैस्त्रय्यन्तैरनुविहित हेषा हलहलं
हताशेषावद्यं हयवदनमीडिमहि महः ॥२॥

समाहारस्साम्नां प्रतिपदमृचां धाम यजुषां
लयः प्रत्यूहानां लहरिवितति-र्बोधजलधेः।
कदा दर्पक्षुभ्यत्कथककुलकोलाहलभवं
हरत्वन्तर्ध्वान्तं हयवदनहेषाहलहलः॥ ३ ॥

प्राची सन्ध्या काचिदन्तर्निशायाः
प्रज्ञादृष्टेरञ्जनश्रीरपूर्वा।
वक्त्री वेदान् भातु मे वाजिवक्त्रा
वागीशाख्या वासुदेवस्य मूर्तिः ॥४॥

हिन्दी अर्थ:
यह स्तोत्र वेदांताचार्य श्री वेङ्कटनाथ (वेदान्तदेशिक) द्वारा रचा गया है, जो कविता और तर्क के शेर कहे जाते हैं।
१ – हम हयग्रीव देवता की उपासना करते हैं, जो ज्ञान और आनंद स्वरूप हैं, जिनका रूप निर्मल स्फटिक के समान है, और जो समस्त विद्याओं के मूलाधार हैं।

२ – हम उस तेजस्वी हयग्रीव को नमस्कार करते हैं — जो स्वभाव से सिद्ध हैं, जो शुद्ध स्फटिकमणि के समान प्रकाशित होते हैं, जिनकी कान्ति अमृत की धारा-जैसी है, जिनकी वाणी से त्रिभुवन पवित्र होता है, और जिनकी घोड़े के समान गर्जना (हेषा) वेदों के सार से निकली हुई है, जिससे सभी दोष नष्ट हो जाते हैं।

३ – जो भगवान सामवेद का सार, ऋचाओं का प्रत्येक शब्द, यजुर्वेद का तेजस्वी प्रकाश हैं; जो बाधाओं का अंत, और बोध रूपी समुद्र की लहरों के समान विस्तार हैं — वे हयग्रीव भगवान की घोड़े-जैसी गर्जना मेरे हृदय के अज्ञान अंधकार को दूर करें, जैसे किसी अहंकारी वक्ता के व्यर्थ कोलाहल को शांत कर दें।

४ – मुझे वे वासुदेव की मूर्ति रूप, वाणी की अधिष्ठात्री देवी के रूप में हयग्रीव देव दीखें — जो वेदों के वक्ता हैं, जिनका मुख घोड़े जैसा है, जो ज्ञानरूपी रात के भीतर से उगती हुई पूर्व दिशा की सांध्य वेला के समान, चेतना को प्रकाशित करने वाली अनुपम कांति से युक्त हैं।

विशुद्धविज्ञानघनस्वरूपं
विज्ञानविश्राणनबद्धदीक्षम्।
दयानिधिं देहभृतां शरण्यं
देवं हयग्रीवमहं प्रपद्ये ॥ ५ ॥

अपौरुषेयैरपि वाक्प्रपञ्चैः
अद्यापि ते भूति मदृष्ट पाराम्।
स्तुवन्नहं मुग्ध इति त्वयैव
कारुण्यतो नाथ कटाक्षणीयः ॥ ६ ॥

दाक्षिण्य रम्या गिरिशस्य मूर्तिर्देवी
सरोजासन धर्मपत्नी।
व्यासादयोऽपि व्यपदेश्य वाचः
स्फुरन्ति सर्वे तव शक्ति लेशैः ॥ ७ ॥

मन्दोऽभविष्यन्नियतं विरिञ्चो
वाचां निधे वञ्चित भागधेयः।
दैत्यापनीतान्दययैव भूयोऽ
प्यध्यापयिष्यो निगमान्न चेत्त्वम् ॥ ८ ॥

हिन्दी अर्थ (श्लोक 5–8):
५।
मैं उस हयग्रीव भगवान की शरण लेता हूँ, जो विशुद्ध विज्ञान के घनस्वरूप हैं, जिनकी दीक्षा ही ज्ञान का विस्तार है, जो करुणा के निधान हैं और समस्त प्राणियों के शरणदाता हैं।

६।
हे प्रभो! आपकी महिमा इतनी महान है कि अपौरुषेय वाणियाँ (वेदवाणी) भी उसका पार नहीं पा सकीं। मैं आपकी स्तुति करता हूँ, भले ही अज्ञानी हूँ; परंतु आपकी कृपा-दृष्टि के कारण ही आपकी स्तुति करने का साहस करता हूँ।

७।
शिव की वाणी की देवी (उमा), ब्रह्मा की धर्मपत्नी (सरस्वती), व्यास और अन्य महर्षियों की वाणियाँ — ये सभी आपकी ही थोड़ी-सी शक्ति से प्रकाशित होती हैं।

८।
हे वाणी के निधान! यदि आपने कृपा न की होती, तो ब्रह्मा भी मूर्ख ही रह जाते और वेदों की शिक्षा से वंचित हो जाते। आप ही वे हैं जिन्होंने दैत्यों द्वारा चुराए गए वेदों को पुनः ब्रह्मा को सिखाया।

वितर्क डोलां व्यवधूय सत्वे
बृहस्पतिं वर्तयसे यतस्त्वम्।
तेनैव देव त्रिदशेश्वराणाम्
अस्पृष्ट डोलायित माधिराज्यम् ॥ ९ ॥

अग्नौ समिद्धार्चिषि सप्ततन्तोः
आतस्थिवान्मन्त्रमयं शरीरम्।
अखण्डसारैर्हविषां प्रदानैः
आप्यायनं व्योमसदां विधत्से॥ १० ॥

यन्मूलमीदृक्प्रतिभाति तत्त्वं
या मूलमाम्नायमहाद्रुमाणाम्।
तत्त्वेन जानन्ति विशुद्धसत्त्वाः
त्वामक्षरामक्षरमातृकां ते॥ ११ ॥

अव्याकृताद्व्याकृतवानसि त्वं
नामानि रूपाणि च यानि पूर्वम्।
शंसन्ति तेषां चरमां प्रतिष्ठां
वागीश्वर त्वां त्वदुपज्ञ वाचः॥ १२ ॥

हिन्दी अर्थ (श्लोक 9–12):
९।
हे देव! आपने विचार की डोलने वाली अवस्था को स्थिर करके ब्रहस्पति को भी ज्ञान की राह पर चलाया। इस कारण देवताओं के राजा (इन्द्र आदि) भी अपने सिंहासन से डिगे नहीं—उनकी स्थिति स्थिर रही।

१०।
जब अग्नि में सप्त ऋषियों द्वारा यज्ञ किया गया, तब आप मंत्रमय शरीर में प्रकट हुए। शुद्ध और सम्पूर्ण हव्यद्रव्यों के द्वारा आप आकाशीय देवताओं को संतुष्ट करते हैं।

११।
जिस मूल तत्व से यह समस्त ज्ञान प्रकट होता है, जो वेदवृक्ष का मूल है, उसे विशुद्ध मन वाले ज्ञानीजन “अक्षर” के रूप में पहचानते हैं—वही आप हैं, अक्षर और अक्षरमातृका (ध्वनि-स्रोत) दोनों।

१२।
आपने अव्यक्त से व्यक्त का सृजन किया। जिन नामों और रूपों का आरम्भ आपसे हुआ है, उनकी अंतिम परिणति भी आप ही हैं। आप ही वाणी के अधिपति वागीश्वर हैं; समस्त वाणियाँ आपसे ही उत्पन्न होती हैं।

मुग्धेन्दु निष्यन्द विलोभनीयां
मूर्तिं तवानन्द सुधा प्रसूतिम्।
विपश्चितश्चेतसि भावयन्ते
वेला मुदारामिव दुग्ध सिन्धोः॥ १३ ॥

मनोगतं पश्यति यः सदा त्वां
मनीषिणां मानस राजहंसम्।
स्वयं पुरोभाव विवादभाजः
किंकुर्वते तस्य गिरो यथार्हम्॥ १४ ॥

अपि क्षणार्धं कलयन्ति ये त्वां
आप्लावयन्तं विशदैमर्यूखैः।
वाचां प्रवाहैरनिवारितैस्ते
मन्दाकिनीं मन्दयितुं क्षमन्ते॥ १५ ॥

स्वामिन्भवद्ध्यान सुधाभिषेकात्
वहन्ति धन्याः पुलकानुबन्धम्।
अलक्षिते क्वापि निरूढ मूलम्
अङ्गेष्विवानन्दथुमङ्कुरन्तम्॥ १६ ॥

हिन्दी अर्थ (श्लोक 13–16):
१३।
आपका स्वरूप — मुग्ध चन्द्रमा से भी मधुर शीतल, आनन्द सुधा से उत्पन्न — ज्ञानीजन अपने चित्त में उसी तरह धारण करते हैं जैसे दूध-सागर की एक मधुर लहर को कोई हृदय से लगाता है।

१४।
जो व्यक्ति अपने मन में सदा आपको देखता है, जो ज्ञानियों के चित्त रूपी मानस-सरोवर में राजहंस के समान निवास करते हैं, उनके सामने वाद-विवाद करने वाले वक्ताओं की वाणी भी मौन हो जाती है।

१५।
जो आपको एक क्षण के लिए भी पहचान लेते हैं, जो आपकी उज्ज्वल किरणों से अपने को आप्लावित कर लेते हैं, वे अपनी वाणी की निर्बाध धारा से भी मंदाकिनी जैसी दिव्य वाणी को भी मंद करने की क्षमता रखते हैं।

१६।
हे स्वामी! जो लोग आपके ध्यानरूपी अमृत स्नान से अभिषिक्त होते हैं, वे धन्य होते हैं। उनके शरीर में उस आनन्द की अदृश्य जड़ें लगती हैं, जो पुलक के रूप में अंकुरित होती हैं।

स्वामिन् प्रतीचा हृदयेन धन्याः
त्वद्द्यान चन्द्रोदय वर्धमानम्।
अमान्त मानन्द पयोधिमन्तः
पयोभिरक्ष्णां परिवाहयन्ति॥ १७ ॥

स्वैरानुभावास्त्वदधीनभावाः
समृद्धवीर्यास्त्वदनुग्रहेण।
विपश्चितो नाथ तरन्ति मायां
वैहारिकीं मोहनपिञ्छिकां ते॥ १८ ॥

प्राङ्निर्मितानां तपसां विपाकाः
प्रत्यग्रनिःश्रेयससंपदो मे।
समेधिषीरंस्तव पादपद्मे
संकल्पचिन्तामणयः प्रणामाः॥१९ ॥

विलुप्तमूर्धन्यलिपिक्रमाणां
सुरेन्द्रचूडापदलालितानाम्।
त्वदङ्घ्रिराजीवरजःकणानां
भूयान् प्रसादो मयि नाथ भूयात्॥ २० ॥

हिन्दी अर्थ (श्लोक 17–20):
१७।
हे स्वामी! जिनके हृदय में आपका ध्यान चन्द्रमा की तरह उदित होता है, वे धन्य हैं। वे भीतर के अमानी (शुद्ध) आनन्द के समुद्र में डूबे होते हैं और अपनी आँखों के जल से (विलक्षण आनन्द से) उस प्रेम को बाहर बहाते हैं।

१८।
हे नाथ! जो ज्ञानीजन हैं, वे आपके ही अनुग्रह से स्वतः अनुभव करने वाले, शक्तिशाली और स्वतंत्र रहते हुए भी आपके अधीन भाव रखते हैं। वे आपकी लीला-माया की मोहिनी चतुराई को भी पार कर लेते हैं।

१९।
मेरे पूर्वजन्मों के तपों का फल यही हो कि मुझे आपके चरणकमलों में प्रणाम करने की इच्छा रूपी चिन्तामणि की प्राप्ति हो। जिससे मुझे नवीन परमकल्याण की प्राप्ति हो।

२०।
हे नाथ! जो आपके चरणकमलों के पराग से पूजित हैं, जो इन्द्र के मुकुट की शोभा बनते हैं, और जो प्राचीन, विलुप्त वर्णमालाओं की पंक्ति को भी प्रकाशित करते हैं—वे चरण-धूलिकण मुझ पर प्रसाद बनकर पड़ें।

परिस्फुरन् नूपुर चित्रभानु–
प्रकाश निर्धूत तमोनुषङ्गाम्।
पदद्वयीं ते परिचिन्महेऽन्तः
प्रबोध राजीव विभात सन्ध्याम्॥ २१ ॥

त्वत्किङ्करालंकरणोचितानां
त्वयैव कल्पान्तरपालितानाम्।
मञ्जुप्रणादं मणिनूपुरं ते
मञ्जूषिकां वेदगिरां प्रतीमः॥ २२ ॥

संचिन्तयामि प्रतिभादशास्त्रान्
सन्धुक्षयन्तं समयप्रदीपान्।
विज्ञानकल्पद्रुमपल्लवाभं
व्याख्यानमुद्रामधुरां करं ते॥ २३ ॥

चित्ते करोमि स्फुरिताक्षमालं
सव्येतरं नाथ करं त्वदीयम्।
ज्ञानामृतोदञ्चनलालसानां
लीलाघटीयन्त्रमिवाश्रितानाम्॥ २४ ॥

हिन्दी अर्थ (श्लोक 21–24):
२१।
आपके दोनों चरण, जो सुंदर नूपुरों की झंकार से युक्त हैं और सूर्य के समान प्रकाशमान हैं, अज्ञान रूपी अंधकार को मिटा देते हैं। वे हमारे हृदय में ज्ञान रूपी कमल की प्रभा में प्रकट हों, जैसे जागरण के समय प्रकट होती है प्रभात की संध्या।

२२।
आपके चरणों में बंधे हुए मणिनूपुरों की मधुर ध्वनि वेदों की वाणी के लिए जैसे एक गुप्त निधि-सी है। वे आपके सेवकों का आभूषण हैं, जो कल्पों तक आपकी सेवा करते रहे हैं।

२३।
मैं आपके उस करकमल का ध्यान करता हूँ जो ज्ञान की दीपशिखा को प्रज्वलित करता है, ज्ञानरूपी कल्पवृक्ष की कोपलों के समान शोभायमान है और जिसमें व्याख्यान मुद्रा (ज्ञान देने की मुद्रा) शोभायमान है।

२४।
हे नाथ! मैं आपके उस दाएँ हाथ को अपने हृदय में स्थापित करता हूँ जिसमें स्पष्ट रूप से अक्षरमाला (जपमाला) सुशोभित है। वह उन भक्तों के लिए ज्ञानामृत की वर्षा करने वाला लीला का घड़ी-यंत्र (घंटिका यंत्र) जैसा प्रतीत होता है।

प्रबोध सिन्धोररुणैः प्रकाशैः
प्रवालसङ्घातमिवोद्वहन्तम्।
विभावये देव सपुस्तकं ते
वामं करं दक्षिणमाश्रितानाम्॥ २५ ॥

तमांसि भित्वा विशदैर्मयूखैः
संप्रीणयन्तं विदुषश्चकोरान्।
निशामये त्वां नवपुण्डरीके
शरद्घने चन्द्रमिव स्फुरन्तम्॥ २६ ॥

दिशन्तु मे देव सदा त्वदीयाः
दयातरङ्गानुचराः कटाक्षाः।
श्रोत्रेषु पुंसाममृतं क्षरन्तीं
सरस्वतीं संश्रितकामधेनुम्॥ २७ ॥

विशेषवित्पारिषदेषु नाथ
विदग्धगोष्ठीसमराङ्गणेषु।
जिगीषतो मे कवितार्किकेन्द्रान्
जिह्वाग्रसिंहासनमभ्युपेयाः॥ २८ ॥

हिन्दी अर्थ (श्लोक 25–28):
२५।
हे देव! मैं आपके उस बाएँ हाथ का ध्यान करता हूँ, जिसमें पुस्तक शोभा पा रही है, जो ज्ञान के सागर के अरुण प्रकाशों को जैसे मूर्तिमान करता है, और जो मूंगे के समूह के समान प्रकाशित है। यह उन भक्तों के लिए सहारा है जो आपकी शरण में हैं।

२६।
आपकी ज्योतियों के विशद किरणें अंधकार को चीर देती हैं, और ज्ञानियों के चकोरों को आनंदित करती हैं। आप नव कमल के समान प्रकट होते हैं, जैसे शरद ऋतु में पूर्ण चंद्रमा आकाश में चमकता है।

२७।
हे देव! आपके कृपामय कटाक्ष सदैव मेरी ओर प्रवाहित हों। वे अमृतमयी वाणी के समान हैं, जो कानों के माध्यम से लोगों में उतरती है और ज्ञान रूपी कामधेनु बनती है।

२८।
हे नाथ! जब मैं विद्वानों की सभा या तर्क-वाद विवाद के युद्ध में ज्ञानियों से जीतने की इच्छा करता हूँ, तब मेरी जिह्वा (वाणी) पर आपका ही सिंहासन स्थापित हो जाए — जिससे मैं विजयी हो सकूँ।

त्वां चिन्तयन्त्वन्मयतां प्रपन्नाः
त्वामुद्गृणन्शब्दमयेन धाम्ना।
स्वामिन्समाजेषु समेधिषीय
स्वच्छन्दवादाहवबद्धशूरः॥ २९ ॥

नानाविधानामगतिः कलानां
न चापि तीर्थेषु कृतावतारः।
ध्रुवं तवानाथ परिग्रहायाः
नवं नवं पात्रमहं दयायाः॥ ३० ॥

अकम्पनीयान्यपनीतिभेदै–
रलंकृषीरन्हृदयं मदीयम्।
शङ्काकलङ्कापगमोज्ज्वलानि
तत्वानि सम्यञ्चि तव प्रसादात्॥ ३१ ॥

व्याख्यामुद्रां करसरसिजैः पुस्तकं शङ्कचक्रे
बिभ्रद्भिन्नस्फटिकरुचिरे पुण्डरीके निषण्णः।
अम्लानश्रीरमृतविशदैरंशुभिः प्लावयन्माम्
आविर्भूयादनघमहिमा मानसे वागधीशः॥ ३२ ॥

वागर्थसिद्धिहेतोः पठत हयग्रीवसंस्तुतिं भक्त्या।
कवितार्किककेसरिणा वेङ्कटनाथेन विरचितामेताम्॥ ३३ ॥

हिन्दी अर्थ (श्लोक 29–33):
२९।
हे स्वामी! मैं आपकी निरंतर चिन्तना करता रहूँ, आपकी वाणी और प्रकाश से भर जाऊँ, और जब मैं सभा में उपस्थित होऊँ तो अपनी वाक्-शक्ति से निर्भय होकर वाद-विवाद युद्ध में विजयी होऊँ।

३०।
कलाओं के भिन्न-भिन्न रूपों को प्राप्त न करने वाला, तीर्थों में अवतार न लेने वाला — ऐसा मैं हूँ। अतः हे नाथ! यह निश्चित है कि मैं आपकी करुणा का हर बार नया पात्र बनता हूँ।

३१।
हे प्रभो! आपकी कृपा से मेरा हृदय बाहरी मतभेदों से हिलाया नहीं जा सकता, और उसमें सत्य के प्रकाश में शंकाओं के अंधकार मिट चुके हैं। अब उसमें तत्वज्ञान की दिव्य ज्योति प्रकाशित हो रही है।

३२।
आप, जो व्याख्यान मुद्रा, पुस्तक, शंख और चक्र धारण करते हैं, जो भिन्न-भिन्न स्फटिक-जैसी आभा से युक्त कमलासन पर विराजमान हैं, और जिनका तेज अमृत के समान निर्मल है — वे वाणी के अधिपति हयग्रीव देव मेरे हृदय में प्रकट हों और मुझे प्रकाशित करें।

३३।
वाणी और अर्थ में सिद्धि प्राप्त करने की इच्छा रखने वाले भक्तिभाव से श्री हयग्रीव की यह स्तुति पढ़ें, जिसे कवितार्किककेसरी वेङ्कटनाथ (वेदान्ताचार्य) ने रचाया है।

 

You cannot copy content of this page