यतिराजस्तोत्रम् ( हिन्दी भाषानुवाद )
यतिराजस्तोत्रम्
भवभयजलधेरेष हि सेतुः पद्मानेतुः प्रणतौ हेतुः
भज यतिराजं भज यतिराजं भज यतिराजं भवभीरो ॥
भवभीरो!
श्रीरङ्गेशय — (जो) श्रीरंगनाथ भगवान की शय्या पर स्थित हैं,
जयाश्रयकेतुः — विजय के लिए शरण ग्रहण करने वालों के लिए ध्वज (प्रेरणा),
श्रितजनसंरक्षणजीवातुः — शरणागत जनों की रक्षा जिनका जीवन है,
भवभयजलधेः — संसार के भय रूपी समुद्र का,
सेतुः हि — वास्तव में वही एकमात्र सेतु (पुल) हैं,
पद्मानेतुः — जो लक्ष्मीपति (विष्णु) के सेवक हैं,
प्रणतौ हेतुः — प्रणतजनों के कल्याण हेतु कारण हैं।
तं यतिराजं भज — उस यतिराज (रामानुजाचार्य) की भक्ति कर।
👉 हिंदी अर्थ:
जो श्रीरंगनाथजी के चरणों में विजय का ध्वज हैं,
जो अपने शरणागतों की रक्षा को ही जीवन का उद्देश्य मानते हैं,
जो संसार-सागर (भव-सागर) से पार पाने के लिए एक मजबूत सेतु (पुल) के समान हैं,
जो लक्ष्मीपति भगवान के चरणों में झुकने का कारण बनते हैं –
ऐसे यतिराज (रामानुजाचार्य) का भयभीत जीव बार-बार भजन करे।
आदौ जगदाधारः शेषः तदनुसुमित्रानन्दनवेषः ।
तदुपरि धृतहलमुसलविशेषः तदनन्तरमभवद्गुरुरेषः
भज यतिराजं भज यतिराजं भज यतिराजं भवभीरो ॥
भवभीरो!
आदौ — प्रारंभ में
जगदाधारः शेषः — जगत् के आधार रूप शेषनाग,
तदनु — उसके बाद
सुमित्रानन्दनवेषः — सुमित्रा के पुत्र (लक्ष्मण) का वेष धारण किया,
तत् उपरि — उसके ऊपर
धृत-हल-मुसल-विशेषः — हल और मुसल धारण करने वाले (बलराम) का रूप धारण किया,
तत् अनन्तरम् — उसके बाद
अभवत् गुरुः एषः — यह (श्रीरामानुजाचार्य) गुरु रूप में प्रकट हुए।
भज यतिराजम् — उस यतिराज की भक्ति करो।
👉 हिंदी अर्थ:
सबसे पहले जो भगवान के शेषरूप में विश्व के आधार बने,
फिर जिन्होंने लक्ष्मण रूप में जन्म लेकर भगवान राम की सेवा की,
फिर बलराम रूप में हल और मुसल (गदा) धारण कर लीलाएं कीं,
उनके बाद यही आत्मा यतिराज गुरु रामानुज के रूप में प्रकट हुई —
इसलिए, हे भयभीत जीव! यतिराज का भजन करो, भजन करो, भजन करो।
भुङ्क्ते वैषयिकं सुखमन्यः प्रचकास्त्येव अनश्नन्नन्यः ।
इति यस्तत्वं प्राह वदान्यः तस्मादधिकः को नु वदान्यः
भज यतिराजं भज यतिराजं भज यतिराजं भवभीरो ॥
👉 हिंदी अर्थ:
जब एक व्यक्ति विषयों का सुख भोगता है और दूसरा बिना भोगे ही तेजस्वी दिखाई देता है –
तो जो यह तत्वज्ञान समझाकर दूसरों को बताता है, वह सबसे बड़ा दानी (उदार) है।
ऐसे तत्वज्ञानी, उपकारक यतिराज का तू बार-बार भजन कर, हे भयभीत जीव!
क्षीणे पुण्ये कः सुरलोकः कामे धूते कस्तव शोकः
भज यतिराजं भज यतिराजं भज यतिराजं भवभीरो ॥ ४॥
✨ हिन्दी अर्थ:
जब नेत्र नष्ट हो जाएँ, तब प्रकाश किस काम का?
जब चित्त मद (मोह/वासना) में डूबा हो, तो विवेक किसके पास होगा?
जब पुण्य क्षीण हो जाए, तो स्वर्ग (सुरलोक) कैसे मिलेगा?
जब इच्छाएँ (काम) पूर्ण होकर नष्ट हो जाएँ, तब शोक किसका रहेगा?
➤ भाव: यह श्लोक जीवन के क्षणभंगुर सत्य को दर्शाता है — जब बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है, तब विवेक नहीं रहता; जब पुण्य खत्म हो जाए तो लोकों का लाभ नहीं; और जब इच्छाएँ मिट जाएँ, तब कोई दुःख भी नहीं रहता। अतः यतिराज (रामानुजाचार्य) की शरण लो।
निशि वनितासुखनिद्रालोलः प्रातः परदूषणपटुशीलः ।
अन्तर्याति निजायुष्कालः किं जानाति नरः पशुलीलः
भज यतिराजं भज यतिराजं भज यतिराजं भवभीरो ॥ ५॥
✨ हिन्दी अर्थ:
रात में स्त्री-सुख और नींद में लिप्त रहता है,
और सुबह दूसरों की निंदा में दक्ष होता है।
इस तरह उसकी आयु धीरे-धीरे समाप्त होती जाती है,
परन्तु वह मनुष्य पशु के समान मूर्खतापूर्वक यह नहीं जानता कि समय बीत रहा है।
➤ भाव: जो जीवन को केवल विषयों और दोषदर्शिता में ही गँवा देता है, वह मनुष्य पशु के समान होता है। इसलिए चेतो और यतिराज की भक्ति करो।
केचिल्लीलालालसगतयः केचिद्बालालालितरतयः ।
केचिद्दोलायितहमतयः केऽपि न सन्त्यर्चितयतिपतयः
भज यतिराजं भज यतिराजं भज यतिराजं भवभीरो ॥ ६॥
✨ हिन्दी अर्थ:
कुछ लोग क्रीड़ाओं और विलास में लिप्त रहते हैं,
कुछ लोग बच्चों और परिवार की ममता में लगे रहते हैं,
कुछ लोग अहंकार में डगमगाते रहते हैं,
परन्तु बहुत ही कम लोग यतिपति (आचार्य/संत) की सेवा-पूजा करते हैं।
➤ भाव: अधिकांश लोग संसार के मोह में फँसे हैं — पर बहुत कम ही लोग ऐसे होते हैं जो सद्गुरु की शरण में जाकर मुक्ति का मार्ग पकड़ते हैं। अतः यतिराज को भजो।
यावानबलो जरया देहः तावान् प्रबलो विषये मोहः ।
वचसि विरक्तिः श्रुतिपरिवाहः मनसि हितस्त्वपरोऽपि विवाहः
भज यतिराजं भज यतिराजं भज यतिराजं भवभीरो ॥ ७॥
✨ हिन्दी अर्थ:
देह में जितनी अधिक जरा (बुढ़ापा/शारीरिक दुर्बलता) आती है,
उतना ही ज़्यादा विषयों के प्रति मोह (कामनाएँ) प्रबल होता है।
वाणी में तो वैराग्य और शास्त्रों की बातें बहती हैं,
पर मन में हित वही प्रतीत होता है जो पुनः किसी विवाह की योजना करता है।
➤ भावार्थ: वृद्धावस्था में भी विषय-वासना छूटती नहीं। मन और वाणी में भेद हो जाता है — वाणी वैराग्यपूर्ण होती है, लेकिन मन फिर भी संसार में रमा होता है। ऐसे भ्रम को त्याग कर यतिराज की भक्ति करो।
कलुषनिकायं ललनाकायं पश्यन्मुह्यसि सायं सायम् ।
जहि जहि हेयं तद्व्यवसायं स्मर निरपायं चरमोपायम्
भज यतिराजं भज यतिराजं भज यतिराजं भवभीरो ॥ ८॥
✨ हिन्दी अर्थ:
नारी का शरीर, जो वास्तव में रज, मल और मूत्र से बना हुआ (कलुषनिकायम्) है —
उसे देखकर तू हर संध्या मोहित होता है।
उस हानिकारक व्यापार (वासना/स्त्रीमोह) को छोड़ दे, छोड़ दे!
और अंतर में नित्य, सुरक्षित, परम उपाय – भगवान को याद कर।
➤ भावार्थ: शारीरिक सौंदर्य माया का मोहक जाल है। इसे पहचान कर, मोह से हटकर केवल परम शरण भगवान में मन लगाओ – यही सच्चा उपाय है।
रात्रिंदिवमपि भिक्षाचर्या कलहायैवागच्छति भार्या ।
मध्ये बान्धवसेवा कार्या कथय कदा तव देवसपर्या
भज यतिराजं भज यतिराजं भज यतिराजं भवभीरो ॥ ९॥
👉 हिंदी अर्थ:
हे मनुष्य! तू रात-दिन भिक्षा के लिए दर-दर भटकता है। तेरी पत्नी केवल झगड़ा करने के लिए ही आती है, उसका स्नेह और सहारा दुर्लभ है।
इसके बीच में तू रिश्तेदारों की सेवा में ही व्यस्त रहता है — कोई बीमार है, किसी की शादी है, किसी का झगड़ा है, किसी की ज़िम्मेदारी।
अब सोचो! इन सांसारिक झंझटों में फँसे हुए तू ईश्वर की पूजा, भक्ति, साधना और आत्मकल्याण के लिए समय कब निकालेगा?
➤ भावार्थ: सांसारिक व्यस्तताओं में उलझकर ईश्वर की भक्ति और आत्मकल्याण के लिए समय न निकालना मानव का सबसे बड़ा संकट है।
अन्धं नयनं भूमौ शयनं मन्दं वचनं मलिनं वदनम् ।
तस्मिन् काले गोप्तुं सदनं वाञ्छसि दत्ततनूजानयनम्
भज यतिराजं भज यतिराजं भज यतिराजं भवभीरो ॥ १०॥
👉 हिंदी अर्थ:
जब बुढ़ापा आता है, तब आँखें धुंधली हो जाती हैं (अंधकारमय दृष्टि), शरीर इतना निर्बल हो जाता है कि ज़मीन पर सोना पड़ता है।
बोलने की ताक़त भी क्षीण हो जाती है, वाणी धीमी हो जाती है, और मुख मलिन व कृश हो जाता है — तेज और सौंदर्य चला जाता है।
ऐसे समय में तू अपने बेटों को पुकारता है, जिनकी तूने परवरिश की थी — सोचता है कि वे अब तेरी देखभाल करेंगे।
➤ भावार्थ: जीवन के अंतिम पड़ाव में, जब शरीर कमजोर और निर्बल हो जाता है, तब इंसान को अपने बच्चों से सहारा और देखभाल की आशा होती है।
तालच्छदकृतकुब्जकुटीरः प्रतिगृहसन्ध्याकबलाहारः ।
विविधपटच्चरभारः क्रूरः सोऽपि विधातृसमाहङ्कारः
भज यतिराजं भज यतिराजं भज यतिराजं भवभीरो ॥ ११॥
👉 हिंदी अर्थ:
वह व्यक्ति जो ताड़ के पत्तों से बनी झोंपड़ी में किसी प्रकार जीवन गुज़ारता है, संध्या को दूसरों के घरों से जूठन या थोड़ी-थोड़ी भिक्षा पाकर जीवन चलाता है।
वह अपनी देह पर जगह-जगह से इकट्ठे किए हुए कपड़ों के चिथड़े लपेटता है, परंतु उसका स्वभाव फिर भी अत्यंत कठोर होता है।
आश्चर्य है — इतना दरिद्र और कष्टमय जीवन जीने के बाद भी वह स्वयं को ब्रह्मा (सृष्टिकर्ता) जैसा समझते हुए अहंकार करता है।
➤ भावार्थ: दुख और दरिद्रता में भी जो व्यक्ति अहंकार नहीं छोड़ता, वह अपने स्वभाव में सबसे कठोर और अज्ञान ही रहता है।
मन्त्रद्रव्यविशुद्धो यागः सर्वारम्भविरागस्त्यागः ।
कर्तुं शक्यो न कलौ योगः किन्तु यतीशगुणामृतभोगः
भज यतिराजं भज यतिराजं भज यतिराजं भवभीरो ॥ १२॥
👉 हिंदी अर्थ:
कलियुग में मंत्र और यज्ञ सामग्री से शुद्ध यज्ञ करना संभव नहीं है। सभी कर्मों से पूरी तरह विरक्ति (त्याग) पाना भी बहुत कठिन है। योग का अभ्यास भी इस युग में कठिन हो गया है। लेकिन फिर भी एक ऐसा मार्ग है जिससे मोक्ष संभव है— वह है यतिराज (रामानुजाचार्य) के गुणों और उनकी भक्ति का रस प्राप्त करना। उनके गुणों का स्मरण ही इस काल में योग का सर्वोत्तम मार्ग है।
उपरि महोपलवर्षासारो मार्गे कण्टककर्दमपूरः ।
कक्षे भारः शिरसि किशोरः सुखयति घोरः कं संसारः
भज यतिराजं भज यतिराजं भज यतिराजं भवभीरो ॥ १३॥
👉 हिंदी अर्थ:
जीवन के मार्ग में ऊपर से भारी ओलों जैसी विपत्तियाँ गिरती रहती हैं। रास्ता कांटों और कीचड़ से भरा हुआ है। कमर पर बोझ है, सिर पर बच्चे का भार है। ऐसे भारी और दुःखद संसार में कौन सुखी रह सकता है? यह संसार अपने कष्टों के कारण लोगों को त्रस्त करता है।
भजसि वृथा विषयेषु दुराशां विविधविचित्रमनोरथपाशाम् ।
कियदपि लभसे न हि तत्रैकं किन्तु व्रजसि महान्तं शोकम्
भज यतिराजं भज यतिराजं भज यतिराजं भवभीरो ॥ १४॥
👉 हिंदी अर्थ:
तुम व्यर्थ ही सांसारिक विषयों की ओर झुकाव रखते हो और दुर्लभ, अनगिनत तरह की इच्छाओं के जाल में फँसे रहते हो। लेकिन उन विषयों में तुम्हें कोई स्थायी सुख या लाभ नहीं मिलता। इसके बजाय, तुम्हें केवल बड़ा दुख और शोक ही प्राप्त होता है। इसलिए सांसारिक वस्तुओं से मोह छोड़कर यतिराज (रामानुज) की भक्ति करो।
कश्चन लोके करपुटपात्रः पातुं सुतमाश्रितमठसत्रः ।
तस्मिन्वृद्धे तं सकलत्रः शपति हि रण्डासुत इति पुत्रः
भज यतिराजं भज यतिराजं भज यतिराजं भवभीरो ॥ १५॥
👉 हिंदी अर्थ:
इस संसार में कोई ऐसा भ्रष्ट, कपटी और पापी पुत्र है जो वृद्ध और निर्बल अपने पिता का, जो मठ या आश्रम जैसे धार्मिक और पवित्र स्थान में निवास करता है, उपेक्षा करता है, उसकी रक्षा न करके उसे नुकसान पहुँचाता है और उसका अपमान करता है। वह पुत्र अपने ही पिता को हर जगह और हर अवसर पर बुरा बोलता है, गाली देता है और श्राप देता है। ऐसे पुत्र को ‘रण्डासुत’ यानी निर्दयी, दुष्ट पुत्र कहा जाता है।
मनुजपतिं वा दिगधिपतिं वा जलजभवं वा जगदधिपं वा ।
ममताहङ्कृतिमलिनो लोको निन्दति निन्दति निन्दत्येव
भज यतिराजं भज यतिराजं भज यतिराजं भवभीरो ॥ १६॥
👉 हिंदी अर्थ:
चाहे वह मनुष्यों का राजा हो, दिशाओं का स्वामी (इंद्र) हो, जल में उत्पन्न जीव हो, या फिर पूरे जगत का प्रभु हो — यह संसार, जो अहंकार (ममत्व) और स्वाभिमान से दूषित है, उनकी निंदा करता रहता है। यह निंदा सतत बनी रहती है, अर्थात् संसार के जीव अहंकार में डूबे होने के कारण, चाहे कोई कितना भी महान हो, उसका अपमान करना, उसका दोष ढूंढना और उसकी आलोचना करना जारी रखते हैं।
पापहतो वा पुण्ययुतो वा सुरनरतिर्यग्जातिगतो वा ।
रामानुजपदतीर्थान्मुक्तिं विन्दति विन्दति विन्दत्येव
भज यतिराजं भज यतिराजं भज यतिराजं भवभीरो ॥ १७॥
👉 हिंदी अर्थ:
चाहे कोई व्यक्ति पापों से मुक्त हो, या पुण्ययुक्त हो, चाहे वह देवताओं, मनुष्यों, ऋषियों या यज्ञों से संबंध रखता हो या उनमें से किसी का भक्त हो — वे सब रामानुज के चरणों के तीर्थस्थल, अर्थात् रामानुजाचार्य के आध्यात्मिक स्थान और उनकी भक्ति से मोक्ष (मुक्ति) प्राप्त करते हैं। यह बात निश्चित और अनिवार्य है।
गुणगुणिनोर्भेदः किल नित्यः चिदचिद्द्वयपरभेदः सत्यः ।
तद्द्वयदेहो हरिरिति तत्त्वं पश्य विशिष्टाद्वैतं तत्त्वं
भज यतिराजं भज यतिराजं भज यतिराजं भवभीरो ॥ १८॥
👉 हिंदी अर्थ:
गुण (जड़ तत्त्व) और गुणी (चैतन्य/जीव) का भेद सदा से है और वह भेद सत्य है। यह चिद्-अचिद् (चेतन और जड़) दोनों प्रकार के तत्त्वों का एक अद्वितीय (विशिष्ट) रूप है, और इन दोनों का शरीर है — हरि (भगवान) का।
इस प्रकार, भगवान का स्वरूप चेतन और जड़ दोनों का आश्रय है — यही विशिष्टाद्वैत तत्त्वज्ञान है। इस सत्य को देखो, और समझो।
यतिपतिपदजलगणिकासेकः चतुरक्षरपदयुग्मविवेकः ।
यस्य तु सालनगर्यवलोकः तस्य पदेन हतो यमलोकः
भज यतिराजं भज यतिराजं भज यतिराजं भवभीरो ॥ १९॥
👉 हिंदी अर्थ:
जो यतिपति (श्रीरामानुजाचार्य) के चरणकमलों के जल से सिंचित है,
जो “नमो नारायणाय” — इस चतुर्वर्णात्मक (आठ अक्षरी) मन्त्र का विवेकपूर्वक उच्चारण करता है,
और जिसे श्रीरंगके दर्शन का सौभाग्य मिला है —
ऐसे व्यक्ति के लिए यमलोक (मृत्यु का भय) केवल एक चरण में नष्ट हो जाता है।
चिन्तय सर्वं चिदचिद्रूपं तनुरिति तस्य हरेरनुरूपम् ।
तस्मात् कस्मिन्कलयसि कोपं पश्चाद्भजसि दुरापं तापम्
भज यतिराजं भज यतिराजं भज यतिराजं भवभीरो ॥ २०॥
👉 हिंदी अर्थ:
इस संसार में जो कुछ भी है — चेतन और अचेतन — वह सब भगवान हरि के शरीर का ही रूप है, यह सोचो।
यदि सब कुछ हरि का रूप है, तो फिर किस पर क्रोध करते हो? क्यों मोहवश क्रोध, द्वेष और पाप में फँसते हो?
बाद में तो उसी का परिणाम दुःख और तप्त करने वाला ताप बनकर सामने आता है।
यश्चतुरक्षरमन्त्ररहस्यं वेद तमेव वृणीहि सदस्यम् ।
तच्चरणद्वयदास्यमुपास्यं तद्विपरीतं मतमपहास्यम्
भज यतिराजं भज यतिराजं भज यतिराजं भवभीरो ॥ २१॥
👉 हिंदी अर्थ:
जो व्यक्ति “नमो नारायणाय” — इस चतुरक्षर मंत्र के गूढ़ रहस्य को जानता है,
उसी को अपने जीवन का सच्चा पथदर्शक, गुरु और शुभसदस्य (आदर्श जीवनसाथी या मित्र) मानो।
उसके चरणों की सेवा ही आराधना है।
जो इस मार्ग के विरुद्ध मत रखते हैं — वे भ्रमित हैं और उनके विचारों की उपेक्षा करो।
वैष्णवकुलगुणदूषणचिन्तां मा कुरु निजकुलशीलाहन्ताम् ।
यतिपतिरेव हि गुरुरेतेषामिति जानीहि महत्वं तेषाम्
भज यतिराजं भज यतिराजं भज यतिराजं भवभीरो ॥ २२॥
👉 हिंदी अर्थ:
वैष्णव भक्तों की जाति, कुल, गोत्र या परिवार की आलोचना और निंदा की चेष्टा मत करो।
तुम्हारा अपना कुलगौरव और आचरण इस तुलना में कुछ भी नहीं।
जान लो — इन भक्तों के लिए श्री यतिपति (रामानुजाचार्य) ही गुरु हैं, और वही उनका सम्मान है।
इसलिए उन्हें तुच्छ न समझो, अपितु सम्मान करो।
सुमसुकुमारं शोभितमारं रतिसुखसारं युवतिशरीरम् ।
गतजीवितमतिघोरविकारं दृष्ट्वा गच्छसि दूरं दूरम्
भज यतिराजं भज यतिराजं भज यतिराजं भवभीरो ॥ २३॥
👉 हिंदी अर्थ:
जो स्त्री शरीर आज अत्यन्त सुंदर, कोमल, श्रृंगारयुक्त, और कामसुख का प्रतीक लगता है,
मरणोपरान्त वही शरीर विकृत, जर्जर, विकराल हो जाता है —
और तब वही मनुष्य उस शव से दूर भागता है, जिसके लिए उसने मोह, लालसा और पाप किए थे।
विद्यानिपुणा वयमित्यन्ये हृद्या धनिनो वयमित्यन्ये ।
सत्कुलजाता वयमित्यन्ये तेषु कलिं परिपूर्णं मन्ये
भज यतिराजं भज यतिराजं भज यतिराजं भवभीरो ॥ २४॥
👉 हिंदी अर्थ:
कुछ लोग गर्व करते हैं — “हम तो बहुत विद्वान हैं”,
कुछ कहते हैं — “हम धनवान हैं”,
कुछ कहते हैं — “हम उच्च कुल में जन्मे हैं”।
मैं तो समझता हूँ कि इन सभी में कलियुग का अहंकार पूर्ण रूप से व्याप्त है।
यमकिङ्करकरमूले शूले पतदभियाति हि फाले फाले ।
दहति तनुं प्रतिकूले काले कं रमयसि तत्काले बाले
भज यतिराजं भज यतिराजं भज यतिराजं भवभीरो ॥ २५॥
👉 हिंदी अर्थ:
यमराज के उस दण्ड (यमकिङ्कर) के मूल में जैसे तीखा कांटा होता है जो बार-बार शरीर को चुभता है और वह अग्नि की तरह शरीर को जला देता है, वैसे ही मृत्यु का दण्ड भी मनुष्य के शरीर को बहुत कष्ट देता है। इसलिए इस भयभीत मन को, जो मृत्यु के समय होता है, उससे लड़ने और उसे शांत करने के लिए आप (यतिराज) की भक्ति करो।
नरवाहनगजतुरगारूडाः नारीसुतपोषणगुणमूढाः ।
नानारञ्जकविद्याप्रौढाः नागरिकाः किं यतयो मूढाः
भज यतिराजं भज यतिराजं भज यतिराजं भवभीरो ॥ २६॥
👉 हिंदी अर्थ:
मनुष्य जो हाथी, घोड़े, गरुड़ (पक्षी) जैसे प्राणियों को पालता है, और स्त्री-संतान की देखभाल करता है, और अनेक कलाओं तथा विद्या-ज्ञान में निपुण होता है, फिर भी वह अपनी बुद्धि के बल पर मोहित और भ्रमित होता है। ऐसे मूढ़ मनुष्य को (जो सांसारिक मोह में उलझा रहता है) परंतु फिर भी तुम यतिराज की भक्ति करो।
यस्य मुखस्था यतिपतिसूक्तिः तस्य करस्था विलसति मुक्तिः ।
नरके पतितं नवनवयुक्तिः नहि रक्षति सामान्यनिरुक्तिः
भज यतिराजं भज यतिराजं भज यतिराजं भवभीरो ॥ २७॥
👉 हिंदी अर्थ:
जिसके मुख से यतिपति (भगवान यतिराज) के सूक्त अर्थात स्तुति शब्द प्रकट होते हैं, उसके हाथों से मुक्तिदायक दिव्य प्रकाश चमकता है। जो मनुष्य नरक में गिरा हुआ हो और अनेक बंधनों में उलझा हो, सामान्य तर्क-वितर्क से उसका उद्धार संभव नहीं। इसलिए ऐसे भयभीत मन को यतिराज की भक्ति करनी चाहिए।
श्रुतिशिरसामत्यन्तविदूष्यं सूत्रानभिमतमतिवैदुष्यम् ।
प्रथमम् मङ्गलमनृतविशेष्यं प्रलपसि किं प्राकृतकृतभाष्यं
भज यतिराजं भज यतिराजं भज यतिराजं भवभीरो ॥ २८॥
👉 हिंदी अर्थ:
जो व्यक्ति अपने कानों के शिराओं (सुनने के अंगों) को अत्यंत विदूषित करता है, जो शास्त्रों (सूत्रों) का विरोध करता है और अपनी अति विद्वत्ता दिखाता है, जो पहली बार शुभ और अशुभ को नहीं समझता, और जो प्राकृत (साधारण) और संस्कृत भाष्यों का अर्थ नहीं जानता, वह क्या कर रहा है? ऐसे भ्रमित मन को भयभीत न होकर यतिराज की भक्ति करनी चाहिए।
तस्करजारविदूषकधूर्ता मस्करिमौनिदिगम्बरवृत्ताः ।
गुप्तधनीकृत धनमदमत्ताः गुरवः किं परवञ्चकचित्ताः
भज यतिराजं भज यतिराजं भज यतिराजं भवभीरो ॥ २९॥
👉 हिंदी अर्थ:
चोर, वृद्ध, विदूषक, चालाक, मृगमरीचिका की भांति मौन रहने वाले, जो अपने आचरण में छिपते हैं, जो गुप्त धन के लिए घमंडी हो गए हैं, और जो गुरु भी हैं पर छल-कपट में लगे हैं — ऐसे लोगों के सामने भी भयभीत होकर नहीं, यतिराज की भक्ति करो।
कान्तिमतीसुकुमारकुमारं केशवयज्वकिशोरमुदारम् ।
रामानुजमहिराडवतारं मूकान्धानपि मोक्षयितारम्
भज यतिराजं भज यतिराजं भज यतिराजं भवभीरो ॥ ३०॥
👉 हिंदी अर्थ:
जो सुंदरी और कोमल बालक हैं, केशव के बाल रूप (कृष्ण रूप) जैसे सुंदर और उदार हैं, जो रामानुज (रामानुजाचार्य) जैसे महान अवतार हैं, वे मूक और अंधों को भी मोक्ष (मुक्ति) प्रदान करने वाले हैं। इसलिए भयभीत मन को यतिराज की भक्ति करनी चाहिए।
काषायाम्बरकवचितगात्रं कलितकमण्डलुदण्डपवित्रं ।
विधृतशिखाहरिणाजिनसूत्रं व्याख्यातद्वैपायनसूत्रम्
भज यतिराजं भज यतिराजं भज यतिराजं भवभीरो ॥ ३१॥
👉 हिंदी अर्थ:
जिसका शरीर काषाय रंग के वस्त्रों से आच्छादित है, जिसके हाथ में कमण्डल और दण्ड पवित्रता का प्रतीक हैं, जिसका सिर शिखा रखी हुई है, जो हिरण के जेवर से बनी माला पहनता है, और जिसका व्रत और शास्त्र-दर्शन प्रसिद्ध दैपायन (व्यास) सूत्र के अनुसार होता है — ऐसे यतिराज की भक्ति करो।
यामुनपूर्णकृपोज्ज्वलगात्रं रामाब्जाक्षमुनीक्षणपात्रम् ।
कोमलशठरिपुपदयुगमात्रं श्रीमाधवसेनापतिमित्रम्
भज यतिराजं भज यतिराजं भज यतिराजं भवभीरो ॥ ३२॥
👉 हिंदी अर्थ:
जिसका शरीर यमुना की पूर्ण कृपा से उज्जवल है, जिसकी आँखें राम के कमल के समान हैं, जो मुनि के दृष्टि का पात्र है, जो कोमल है पर शठ (चालाक) शत्रुओं को नष्ट करने वाला है, और जो श्री माधव सेनापति का मित्र है — ऐसे यतिराज की भक्ति करो।
सालग्रामे सर्वहितार्थं येनास्थापि गुरोः पदतीर्थम् ।
तत्कुलदैवतहितपुरुषार्थं सकलोपायाधिकचरमार्थम्
भज यतिराजं भज यतिराजं भज यतिराजं भवभीरो ॥ ३३॥
👉 हिंदी अर्थ:
जो सालग्राम (पवित्र शिला) में सभी कल्याणकारी कार्यों के लिए स्थापित है, जो गुरु के चरणों की तीर्थ रूप है, जो कुल देवता के हित के लिए है, और जो सभी साधनों से अधिक फलदायक है — ऐसे यतिराज की भक्ति करो।
प्रवचनसक्तः प्रज्ञायुक्तः परहितसक्तः परमविरक्तः ।
नानादैवतभक्त्या युक्तः न भवति मुक्तो भवति न मुक्तः
भज यतिराजं भज यतिराजं भज यतिराजं भवभीरो ॥ ३४॥
👉 हिंदी अर्थ:
जो प्रवचन में रत है, जिसमें प्रज्ञा (बुद्धि) है, जो परहित (दूसरों के कल्याण) के लिए समर्पित है और जो परमोच्च विरक्ति (संसार से तिलस्म और मोह से ऊपर) का अनुभव करता है, और जो विभिन्न देवताओं की भक्ति करता है — ऐसा व्यक्ति मुक्त नहीं होता। इसलिए, ऐसे भयभीत मन को केवल यतिराज की भक्ति करनी चाहिए।
सन्त्यज सकलमुपायाचरणं व्रज रामानुजचरनौ शरणाम् ।
पश्यसि तमसः पारं नित्यं सत्यं सत्यं पुनरपि सत्यम्
भज यतिराजं भज यतिराजं भज यतिराजं भवभीरो ॥ ३५॥
👉 हिंदी अर्थ:
सभी साधनों को त्यागकर, जो रामानुजाचार्य के चरणों में शरण ग्रहण करता है, वह निरंतर अज्ञान और अंधकार से परे सत्य को देखता है। सत्य है, सत्य है, पुनः सत्य है। इसलिए ऐसे भयभीत मन को यतिराज की भक्ति करनी चाहिए।
भगवद्रामानुजषट्त्रिंशः सालग्रामगुरूत्तमवंश्यः ।
कौण्डिन्यः कविराह पवित्रं रङ्गार्यो यतिराजस्तोत्रम्
भज यतिराजं भज यतिराजं भज यतिराजं भवभीरो ॥ ३६॥
👉 हिंदी अर्थ:
यह यतिराजस्तोत्र भगवान रामानुज के ३२वें अवतार द्वारा लिखा गया है।
रचयिता कौण्डिन्य नामक एक पवित्र और महान कवि हैं, जो सालग्राम और गुरु के श्रेष्ठ वंश के हैं।
इसलिए हे भयभीत मन, यतिराज की भक्ति करो, उनकी आराधना करो।
भज यतिराजं स्तोत्रम् सम्पूर्णम्
